Friday, October 2, 2020

*समवेत स्वर*  चन्द्ररेखा सिंह 

जीवन को समवेत स्वरों मे गाओ तो ,पीड़ा से दुखते मन को सहलाओ तो ,

अपनो मे तो अपनापन पा लेते  सब ,तुम ग़ैरों मे भी  अपनापन  पाओ  तो ,

जीने का अन्दाज़  नया  पा जाओगे  ।

अधियारों  से  भी  प्रकाशकण  फूट रहे इन्हे  तराशो , काट छांट  कुछ नया  गढ़ो ।

इकलेपन  की स्याही  और हुई  गाढ़ी  ,लसन्नाटों ने  लिखा बहुतकुछ उसे पढ़ो ,

अपनो बेगानों  का  सच  पा जाओगे  ।

अपनी  सीढ़ी स्वयं बनाओ और  चढ़ो ,अपनी राहें स्वयं बनाओ और  बढ़ो  ,

हार जीत  के  पैमाने सब  बदल  चुके ,संघर्षो का शोर कह रहा लड़ो  लड़ो  ,

विजयवधू  की वरमाला  पा जाओगे  ।

अपनी लघुता  का  अनुमान  लगाओ तो ,मन से  प्रभुता का अभिमान हटाओ तो  ,

ऊंचाई पर रहोभले नत  शीष  रखो  ,कल्याणी धरती का  दर्द  मिटाओ  तो  ,

सत्  चित्  औ आनन्द  सभी  पा जाओगे  ।

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लेखिका श्रींमती अलका मधुसूदन पटेल

ज्ञानदीप

अंतस का दीप जलाओ , तुम प्रकाशपुंज बनो।तिमिर छाया है चहुँ ओर, किरण आलोक बनो। 

अपनी राह बनाओ और बढ़ो ,बनो अग्निशिखा,संघर्षों से लड़ो औ नित बढ़कर उत्कृष्टता चुनो।

अंधेरे तो हैं, घेरेंगे, रहेंगे, वे बार-बार टकराएंगे ।कुटिलता से हम डरेंगे ,हर पल उतना डराएंगे।

अंधेरे केवल रातके नहीं,मनके अंदर भी होते हैं,दूरकरो प्रज्ञा से ,साहसी बन विश्वास जगाएंगे।

वेदना के स्वर भूलकर ,समवेत गीत गुनगुनाना।सन्नाटों को हंसी खुशी के, सुपलों में है बदलना।

दुर्बलता नहीं,सबलता सेअब कदमों को बढ़ाना,सपने पीछे छूट गए ,अब है विजयरथ ही पाना।

अपनों में बेगाना, गैरों में अपनेपन को पाओगे।स्व प्रभुता-लघुता में रचकर स्नेहदीप जलाओगे।

ऊंचाई पर रहकर भी, जमीन में बोध फैलाओगे , अपनी खुशी ,धरणी में बांट आनंदमय बनाओगे।

नन्हा सा दीपक तुम्हारा,देखो प्रकाश बांट रहा।ज्योतिअखंड बन सुंदर, ज्ञानचक्षुओं से हो हरा।

होँगे दूर अंधियारे,ज्योति से तुम्हारी हो पल्लवित बने प्रकाश दीपमाला ,हैं, देखो दे रहे उजियारा।

2    'विजित'

करना  होगा  संघर्ष ,पाने को नवउत्कर्ष।

चुनौतीसे जो जुझौगे , तब चुन पाओगे हर्ष।

सत्य से  हटना नहीं, दम्भ से  घिरना नहीँ।

लालसाएं रोकेंगी पथ, लेनी होगी तुम्हें शपथ।

मार्गच्युत  होना नहीं, बाधाओंसे डरना नहीं।

संकट करेंगे विचलित, करना  स्व प्रकाशित।

अपनी दिशा पहचानो, लक्ष्य  उद्देश्य बनाओ।

निर्बंध  निर्बाध  बढ़ो, उन्नति की सीढ़ी चढ़ो।

ध्येय-अविरल लक्षित जिंदगी सहज 'विजित'


3 *रंगों की कैसी है ये बौछार*

अब त्यौहार कहाँ रहा रे भाई, कहाँ रहा है त्यौहार।

भाव भंगिमा शब्द बदलते जाते नहीं बचा ब्यौहार।

 मन अब बदल चले है छद्म रंगों से बन रहे रंगदार।

मिलते अमर्यादित आचरण गंदे शब्दों की बौछार। 

राजनीति के रंगों ने ह्रदय बदला-बदल दिया है प्यार। 

सीधे सादे लोग भी अनजाने झेल रहे हैं वार पे वार। 

नित कड़वी बोली,होती फीकी गुजिया ओ रंग-धार। 

मिठाई बदलती खटाई में ,बदरंग हो बनते हथियार।

अब त्यौहार कहाँ रहा रे भाई , कहाँ रहा है त्यौहार। 

बुनने होंगें फिर सतरंगी सपने, वही मान ओ मनुहार।

कल्पनाओं के क्षितिजों से ,अनुबंधों के सुंदर से हार।

चलो फिर ढूढें रस रंगों के, रिश्ते नए संकल्पों केद्वार।

स्वाद बदलें जिंदगी का, जीभ का ,मिलें नए आचार।

ख़ुदी को करें बुलंद ,लौटा लाएं वही रंगीला त्यौहार।

आएगी फिर वही सूंदर होली की रंग बिरंगी बौछार । 

अलका मधुसूदन पटेल ।

खिलकर सुमन,बोल रहे खुशबू से,खुशबू बिखरे , कह उठी भौरों से।

भौंरे करें गुंजन,बोलें तितलियों से,तितली उड़ी कहने अम्बर मेघों से।

बदरेझिलमिल,भीगाआंगन जलसे,आया सावन, हां नागपंचमी आयी।

जन्मदिवस की सुखद बेला हैआयी,अर्पणकर पुष्प,अद्भुत शक्ति हैपाई।

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मानता हूँ यह बहुत पहले नहीं मैं जान पाया, कौन सी प्रतिभा छिपी मुझमें, नहीं पहचान पाया, पर समय अब भी बचा है, अब कलम झकझोरती है, मंद गति मेरी हुई पर लेखनी अब दौड़ती है। इक पहेली जिंदगी, मुझसे सुलझती ही नहीं थी, आग थी मुझमें छिपी, पर वह सुलगती ही नहीं थी, और यह दुनियां भी मेरा साथ अब तो छोड़ती है, मंद गति मेरी हुई पर लेखनी अब दौड़ती है।

 २। बंद द्वार खुलने दो -------


दीप जला और झरने लगा प्रकाश 

प्रगट हुआ ,  दिव्यता का विभास।

एक एक किरण, कर आनंद का वरण 

कर रही नर्तन , होने लगा परिवर्तन।

अंधकार सिमटने लगा,उजियारा छिटकने लगा।

बज उठा एक तारा,मिटा अंतस अंधियारा।

बिन गाये  गीत ,अददृष्य बना मीत।

चलो चलें ,करें दीपशिखा का अभिनंदन ।

करें हर किरण का वंदन,

 होश में आना है ,कर प्रवेश बोध में 

बोध हो जाना है ,बोध ही जीवन है ।

वही है सत्य वरण ,वही है दिव्य चरण।

वही है शांति वही है क्रांति

हर रंग है झर रहा ,प्रकाश है बरस रहा।

हर ओर इंद्रधनुष ,छत को तरश रहा 

फूल फूल ,कूल कूल ,अपना रंग भर रहा।

बोध जब जागेगा तभी कलुष भागेगा 

बंद द्वार खुलने दो ,जीवन को सजने दो।अति महत्वपूर्ण पंक्तियाँ


 1 ईर्ष्या के मारे जब दूसरे ,बुरा सलूक करें मेरे साथ।

निंदा करें गालियां दें मुझे ,सह सकूँ मैं नुकसान और पराजय।

और जीत उन्हें अर्पित कर सकूं।


 2 जिसकी मैंने मदद की और बड़ी उम्मीद से लाभ पहुँचाया ।

वही जब बुरी तरह चोट पंहुंचाए मुझे।

मैं कृतज्ञ होऊं उसका ,मान सकूँ अपना सर्वोपरि गुरु उसे।


3    *अंधेरों की उमर*

जब रगों मेँ 

पसरने लगे अंधेरा ,

औऱ साथ छोड़ दें 

दुनियाभर की

 बिजलियाँ।

प्रवेश करना

 अपने भीतर 

वहां जल रहे होंगे 

सहस्त्रों दिए ।

अंधेरे की उमर 

चार पहर से अधिक 

भला कब हुई ,

खटखटाना 

साहस और धैर्य 

की कुंडियां 

सूरज खुद

दरवाजा खोलेगा।

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आओ सजन वर्षगणना करें

बीते वर्षों का अवलोकन करें

पहला वर्ष आँधियों  की गर्द

दूसरा वर्ष एक संघर्ष

तीसरा वर्ष सुनहरा ख्वाब

चौथे पांचवें हवा हो गए

बिटिया के साथ कहाँ खो गए

ज़िन्दगी मस्त गुज़रने लगी

अभावों में भी रौशन होने लगी

सातवें वर्ष सूरज रौशन हुआ

एक नया मेहमान

ज़िन्दगी में आ गया

परिवार पूरा हो गया

आठवां वर्ष संघर्ष लाया था

बेटे को भारी बताया था

मगर ज़िन्दगी रफ़्तार पकडती रही

जाने कितने मौसम बदलती रही

कभी मौसम आते जाते रहे

कभी ज़िन्दगी में ठहरते रहे

कुछ पतझड़ भी आने बाकी थे

ज़िन्दगी के इम्तिहान बाकी थे

कभी आत्मा लहूलुहान होती रही

कभी ज़िन्दगी से लडती रही

एक छोर तुमने सम्हाला था

दूजा मुझमे समाया था

संघर्षों ने हमको बताया था

ज़िन्दगी फूलों की सेज ही नहीं

काँटों के बाग़ भी मिलते हैं

बचकर चलने वाले ही पार निकलते हैं

अपने परायों की पहचान होने लगी

ज़िन्दगी भी हैरान होने लगी

कभी हम परेशान होते थे

अब ज़िन्दगी परेशान होने लगी

कैसे ये हँस लेते हैं

ज़िन्दगी से लड़ लेते हैं

जीना आखिर हम सीख ही गए

45 वर्ष पल में बीत गए

क्या खोया क्या पाया है

इसका ना हिसाब लगाया है

अब चाहतों की कोई चाहत नहीं

बीते वर्षों के अवलोकन में

एक बात समझ आ गयी

किसी सहारे की आदत नहीं

मगर एक दूजे बिन हम अधूरे हैं

इतना हमें समझा गयी

ज़िन्दगी हमें रास आ गयी


आओ सजन आने वाले कल में

एक नया कल सजायें

अब ज़िन्दगी को उसका मुकाम दिलाएं

जो छूट गया था जीवन में

उसको अब सफल बनाएँ

कुछ अपने कुछ तुम्हारे सपनो का

एक नया जहान बनाएँ 


 ज़िन्दगी की अनुभूतियाँ ज़िन्दगी के साथ रहती हैं और कदम कदम पर एक नया अहसास देती हैं फिर चाहे एक अरसा ही क्यों ना बीत गया हो मगर जेहन में ताज़ा रहती हैं कम से कम वो जिन्हें हम याद रखना चाहते हैं .उन्ही यादों में से कुछ यादें साथ साथ चलती हैं और ले जाती हैं हमें एक ऐसे जहान में जहाँ हम उनसे रु-ब-रु होते हैं तो पता चलता है वक्त तो अभी शायद वहीँ खड़ा है जिसे हम सोच रहे थे कि फिसल गया हाथ से वो तो आज भी उसी दहलीज पर इंतज़ार में खड़ा है कि कब कोई आएगा दिया रोशन करने .


वक्त ने किया क्या हसीन सितम हम रहे ना हम तुम रहे ना तुम...........कितना सही कहा है किसी ने ...........ऐसा ही तो होता है जब एक पौधे को एक आँगन से उखाड़ कर दूजे में रोपा जाता है और फिर वो उस आँगन की हवा , पानी , मिटटी और स्नेह से धीरे धीरे वहाँ खिलना शुरू कर देता है ...........उसे उस आँगन में कोई अपना मिल जाता है जो उसके जीवन में साथी की कमी पूरी कर देता है तो वो उसमे अपना जीवन देखने लगता है और वक्त के साथ वो पौधा एक वृक्ष बन जाता है  मगर साथ चलते चलते उसका साथी और वो पौधा कब एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं पता ही नहीं चलता एक के बिना दूजे का अस्तित्व जैसे अधूरा लगने लगता है ..........कब साथी से एक बहुत अच्छे दोस्त बन जाते हैं उन्हें पता नहीं चलता मगर ये वक्त है ना सब बता देता है जब एक अरसा साथ रहने के बाद एक दूसरे की अहमियत का अहसास होता है.




 अपना रास्ता बनाना होगा। 


रो चुकीं, 'बहुत' सो चुकीं तुम।

डर चुकीं, छलीं जा चुकीं तुम।


जागो ! अब खोने का,सोने का समय है नहीं । 

दृढ़ बन पहला पग बढ़ाओ मिलेगी नई राह यहीं।

चेतना ही नहीं ,स्वयं को जगाना होगा। 

अपने सम्मान केलिए कदम  बढाना होगा। 


करों में परिश्रम लिए,मन में सूंदर स्वप्न लिए। 

सजग सरल मन ,कर्मठ स्वस्थ तन लिए हुए। 

होठों में सुंदर राग मुट्ठी में, आसमान समेटे हुए।

 भावनाओं की छलकती सरिता नेत्रों में लिए।


 *उठो! बढ़ो*! अपनी शक्ति पहचानो,अपने नभ को तोलो।

 विराट जगत की स्वामिनी हो तुम,बंद हैं कपाट,अब खोलो। 

बहुत सो चुकीं, बहुत रो चुकीं बहुत छलयात्री बन चुकीं तुम। 

बहुत रहीं मौन व्यथित, वेदना त्याग,बनालो नया जीवटतुम! 


साजिशों से घिरीं, बंदिशों में बंधी,रहीं गुमराहगलत राहोंमें। 

अंत करो! इस भेद नीति का, करो मेधा ज्वलंत मशालों में।  

उठाना ही होगा, पहला चरणअपनी आस्था विश्चास से।

बचाने अस्तित्व अपना ,हां जूझना पड़ेगा सामने डर से। 

  

सभी मत, भ्रम, लालच,मोह -माया स्वार्थों को त्यागो तुम। 

अबला नहीं,कर्तव्य व शक्ति कीअपूर्व सामर्थ्य हो तुम। 

परछाइयों से बाहर निकल। अपना आशियाँ बनाना होगा। 

लगेगा पगपग अड़ंगा तुमको उनसे टकराना होगा । 


ना घबराना,हुलसाना आशाएं, अपेक्षाएं,आस्थाऐं तलाशना।

धरा से आकाश तक की यात्रा है तुमको अब करना। 

लो कुछ कर दिखाने का *संकल्प* बनो *अग्निशिखा*! 

बनके प्रचंड देवी दुर्गामां जैसी अंत करो राह के राक्षसों का। 

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अलका मधुसूदन पटेल

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 आस्थाऔं के बीज

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  मेरे पास ढेर से

 आस्थाऔं के बीज हैं

  इन बीजों को

 अपनी मुट्टियों में भर कर

 छिटकते हुये  चलना तुम

 सुनो,,,,

मेरे पास एक तेज़ धारदार

विद्रोह का हंसियाँ भी है

जहाँ कहीं भी तुम्हेंं  दिखाई दे

बारुद की फसल़

दुई और द्वैष की फसल

 अंहकार की फ़सल

जहाँ हो जुल्म बलात्कार

देश द्रोही चाटुकार

इस तेज़धार हँसिया से काट कर 

उस सुनी धरती पर

आस्थाऔं के बीज़ छिड़क देना......

SONIYA

   


Tuesday, October 9, 2012

अलका मधुसूदन पटेल ,लेखिका+साहित्यकार.


नारी सशक्तिकरण-----

IF YOU WISH TO REACH THE HIGHEST ,BEGIN AT THE LOWEST

*नारी महिमा* -

प्रभु सत्ता की प्रबल शक्ति ,अति मानवता का अतुल विकास.
पूर्ण विश्व की जन्मदायिनी ,विधि संस्कृति का सफल प्रयास.
देवगणों की वन्दनीय नित , हरी की एकमात्र छाया.
नारी की सत्ता इस जग में , नारी की ही है माया.

*आवश्यकता* -

आज की परिस्थितियों में नारी शक्ति को अपनी पहचान बनाने के लिए अपनी विशिष्टता का अहसास करके आत्मबल बढ़ाना होगा. जिसके लिए बचपन से बच्ची के मन में आत्म-विश्वास जाग्रत करना होगा. प्राचीन समय से चली आ रही प्रथाओं और लड़कियों के प्रति समाज में अपनाये जा रहे दोहरे मापदंड-शोषण को कम करने हेतु आवाज उठाना ही होगा. इसके लिए आत्म-निर्भरता की ओर कदम बढ़ाने होंगे. इसके लिए बालिका के अपने परिवार में जन्म लेते ही उसकी शिक्षा -देखरेख में भेदभाव नहीं रखकर समानता लाना होगा. जिस भी विषय में उसकी रूचि हो उसी में पूर्ण शिक्षिता बनने से न केवल उसका आत्म सम्मान वरन उसके परिजनों का सम्मान बढेगा.ज्ञातव्य है जब हमारा आत्मबल जाग्रत होता है तो दुनिया की समस्त शक्तियां छोटी पड़ जाती हैं .नारी-शक्ति को स्वयं इसका अहसास कराना होगा.  यदि एक बालिका का प्रारंभ से सही पालन-पोषण किया जाये तो वह एक पुरुष से कहीं पीछे नहीं है. हाँ प्रकृति प्रदत्त शारीरिक कोमलता उसकी कमजोरी नहीं संसार का अद्भुत वरदान होता है. सदियों से महिलाओं को वैश्विक स्तर में भी समाज के हाशिये पर रखा जाता रहा है. उनका सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक - भावनात्मक तरीके से मजबूरी व मासूमयित का फायदा उठाये जाता रहा है. उनको आधी दुनिया तो बोला जाता है पर उनको हाशिये में रखकर उनके मानव-अधिकारों तक से वंचित रखा जाता रहा है.

मेहनत तो रंग लाती है चट्टान तोडिये ,पावन पसीना ही तो गंगाजल का रूप है.

*चैतन्यता* -

उठी है मन में तरल तरंग ,भरे उत्कर्षित अंग उमंग.
हमीं हैं भारत की ललना ,प्रण जो कभी न टलना.

आज सामाजिक,सांस्कृतिक ,पारिवारिक मूल्यों में निरंतर चेतना बढ़ रही है, परिवेश बदल रहे हैं. वास्तव में समाज में भी कर्तव्यबोध की भावना बढ़ रही है धीरे-धीरे ही सही. महिलाऐं अपने आप को सक्षम बनाकर पुरुष वर्ग के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं. अतः अब परिवारों में भी लड़की होने को अभिशाप नहीं मानने वालों की संख्या में वृद्धि निश्चय ही हो रही है. मुख्यतः नव-युवा वर्ग अपनी छाप छोड़ने में सशक्त बना है. समाज के लगभग हर क्षेत्र में बहुत तेजी से महिला शक्ति अपना स्थान बढाती जा रही है. अपनी योग्यता से उसने अपना इतना ऊँचा स्थान बना लिया है. लोग उसका मान करने लगे हैं ,उसके आधीन काम करने से गुरेज नहीं कर सकते क्योंकि अपनी शक्ति पहचान के नारी ने स्वयं को उत्कृष्ट बना लिया है. कह सकते हैं उसकी दुनिया बदल रही है, जिसकी वह स्वयं हक़दार है. संघर्ष करके अपना यह स्थान वह स्वयं बना रही है.

*सामाजिक परिवर्तन* -

हमारी ही मुठ्ठी में है आकाश सारा,जब भी खुलेगी तो चमकेगा तारा.
कभी न ढले वो ही सितारा, दिशा जिससे पहचाने ये संसार सारा.

पुरुष वर्ग के साथ परिवार में अब विशेषकर महिलाओं को भी अपनी पुत्रियों के लिए या बालिका के लिए अपना नजरिया बदलना होगा क्योंकि जीवन की जिन कठिनाइयों से वे बड़ी-पली हैं ,उनको लगता है की उनकी पुत्री को भी वही कष्ट न हो. उनकी खुद की जिंदगी में वे जिस कमी ,भेदभाव,शोषण या ना-इंसाफी का शिकार हुईं हैं ,होती रही हैं. उनकी बेटी - बहू या समाज की हर बच्ची के साथ न हो. इसीलिए वे अपने परिवार में पुत्री के आगमन से निराशा से भर उठतीं हैं . सर्वप्रथम वे भी किसी भेद-भाव-भुलावे से अपने मुक्त रखें. विशेषकर अपने घर में बेटी-बेटे में कोई भेदभाव नहीं करके उनको समान अवसर दें.
सही मानें तो जब परिवार की मुखिया महिला ही अपने परिवार को सही संस्कार व सामाजिक मूल्यों के साथ बचपन से ही बेटी को पूर्ण जागरूक व सशक्त बनाएगी तो सारे परिवार व समाज में अन्य लोग स्वतः ही अपनी बच्ची को साहसी-योग्य बनायेंगे. उसको उसके अंदर की शक्ति को मनोवैज्ञानिक तरीके से बढ़ावा दिया जाये ना कि प्राकृतिक शारीरिक कमजोरी का अहसास कराके उसका मनोबल कम किया जाये.
हर क्षेत्र में जागरूकता की बहुत जरुरत होती है.उच्च से उच्च शिक्षा दें.

“रबिन्द्रनाथ टैगोर” ने कहा है ,

where the mind is without fear & the head is held high ,where knowledge is free .

*पारिवारिक परिवर्तन* -

अपने परिवार से ही शुरुआत करके व्यापक बदलाव करने होंगे. समाज के हर वर्ग के लिए इस समस्या के निदान ढूंढने होंगे. वैसे भी सर्व-विदित है कि एक बेटी दो कुलों को जोड़ने के साथ ,अपने परिवार से दूसरे परिवार में अपने को आत्मसात करने के बाद भी ( अपनी शादी के बाद) जुडी रहती है पूरा ध्यान रखती है. हाँ हमें अपनी बच्चियों को संपूर्ण सशक्त -सफल -अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता की पहल उसके जन्म से ही शुरू करनी होगी. जब तक हम स्वयं अपने घर में से ही हमारी बच्चियों का आत्मबल बढ़ाने का ध्यान नहीं रखेगे तो किसी जादुई चमत्कार की आशा दूसरे से नहीं कर सकते. अभी हमें बहुत कुछ करना बाकी है.पहला कदम उठाकर समाज में बदलाव होगा ही. हमारी बेटियों को उनकी शिक्षा के साथ अपनी रक्षा की जानकारी भी देनी ही होगी. ऐसे अनेकों माध्यम हैं कि माँ-बाप घर बैठकर भी अपनी पुत्री के प्रति निश्चिन्त बने रहें. बाहरी दुनिया के उतारों -चढ़ावों के साथ उससे सावधानी व फरेबों से बचने के साधन. अच्छे-बुरे,सही-गलत की पहचान से उसके व्यक्तित्व को संवारने की जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभानी होगी.

The future belongs to those who believed in the beauty of their dream .

*हिंसात्मक पहलू* -

इस अँधेरी रात को हरगिज मिटाना है हमें ,इसलिए हर महिला की शक्ति जगाना है हमें.

बाहरी हिंसा व घरेलू हिंसा के साथ समाज में दिनों-दिन बढ़ते हिंसात्मक व्यवहार-बलात्कार से अपनी सुरक्षा व अपने परिवार की सुरक्षा किस तरह की जाये इसकी जानकारी हेतु वृहद उपाय किये जाने होंगे. घरेलू+कामकाजी महिलाओं को अपनी भूमिका सक्षम बनानी होगी ,अपनी बच्चियों को अधिक मूलभूत सुविधा दिलवाने के साथ सतत निगरानी के दायित्व भी निभाने होंगे व उन पर विश्वास करके उनके कर्तव्यों से परिचित कराना होगा ताकि वे किसी गलत लालच या मतिभ्रमित होने से बचें. वे समाज-परिवार व अपनी जिंदगी में सामान्य संतुलन बनाकर निडर होकर अपना जीवन सार्थक सकें. उनके साथ होते अनाचार या ज्यादती को वे खुलकर व अपनी बात कहने में हिचक महसूस ना करें. बालिकाओं की प्रगति व उत्थान के लिए आन्दोलन का प्रारंभ नए तरीके से करना है तो बारम्बार अनेकों अत्याचार व दुर्घटनाओं से हम मात्र विचलित होकर नहीं रहेंगे.

*सशक्तिकरण* -

कंटकों में पथ बनाना सीख लो कठिनाइयों को सरल बनाना सीख लो .
जिंदगी सुखद तुमको लगने लगेगी ,जिंदगी को अच्छा बनाकर देख लो.

आत्म सम्मान से संस्कृति ,धरोहर की रक्षा करके ,सक्षम दृढ संकल्पित होकर नवदीप प्रज्वलित करना है.आज की स्त्रियाँ उच्च स्तरीय उच्चकोटि विराजित हुईं हैं आसमान में उड़ने की कोशिश करें ,पर उनके पैर जमीन पर रहें .झूटे अहम् या घमंड में न आयें. आधुनिक समाज भी जIन चूका है की अब हमारी महिला शक्ति को पिंजरे में बंद रखने का समय जा चूका है. महिला शक्ति एक साथ मिलकर चलें ,इतनी कड़ी मशक्कत से आज वे अपना जो स्थान बना पायीं हैं.  उसमे वे अपनी वैचारिक क्षमता बढाकर  चारित्रिक बल मर्यादा,सीमा ,गरिमा का गौरव सदैव बनाये रखें.

श्रंखलाएं हों पगों में,गीत गति में है सृजन का ,

है कहाँ फुर्सत पलक को ,नीर बरसाते नयन का,

उठो आगे बढ़ो ,ये समय है कुछ कर दिखाने का.

The first step forward ,solving a problem is to begin .

*जयहिंद-जय महिला-शक्ति*.

अलका मधुसूदन पटेल ,लेखिका+साहित्यकार.







Saturday, July 17, 2010

सामाजिक सरोकार
*अपनी संपूर्ण सुरक्षा की पूर्ण चैतन्यता-जागरूकता+कानून सम्बन्धी जानकारी*.
परिवारों में विशेषकर भारतवर्ष में बेटी के जन्म लेते ही ये बात बचपन से उसके मन में भर दी जाती है कि उसके भाई की तुलना में वो शारीरिक स्वरुप में कमजोर है ,बहुत प्रकार के अवरोध(रोक) उसकी कम उम्र से ही लगाना प्रारंभ हो जाते हैं .लड़के की तुलना में उसको कुछ विशेष सावधानी-देखरेख से ही पाला जाता है. जो उसकी मानसिकता को कमजोर बना देते हैं. छोटी सी बच्ची अपने घर में ही अपने आपको हीन या किसी कमी से ग्रस्त मानने लगती है क्योंकि उसके लिए जीवन के हर क्षेत्र में अलग-अलग प्रकार से रोक लगने से उसकी स्वतंत्रता में कमी-बाधक हो जाती है.
बिना जाने ही समाज के प्रति या अपने आसपास वालों के प्रति उसके मन में एक प्रकार चिंता व जाना-अनजाना डर या अलगाव समां जाता है.
ये बिना किसी भेद भाव से समाज के हर वर्ग के लगभग हर छोटे-बड़े ,निम्नवर्गीय-मध्यमवर्गीय-उच्चवर्गीय ,हम-आपके सबके परिवारों में होता है. अधिकांश परिवार अपनी बेटी की सुरक्षा की द्रष्टि से उसपर रोक लगाने को अपने को मजबूर पाते हैं .इस सबके पीछे परिवार का उद्देश्य हर जगह अपनी बच्ची के साथ सिर्फ भेदभाव के लिए ही नहीं होता.व्यक्तिगत नहीं होकर कहीं निःस्वार्थ मजबूरी भी मानी जा सकती है या अपनी बेटी के प्रति अपनी सघन जिम्मेदारी-स्नेही उत्तरदायित्व भी.
हालाँकि हर बात में बारबार ऐसे अड़ंगे-थोड़ी समझ आने पर स्वाभाविक हमको, हमारी बेटियों या नारी शक्ति को अस्वीकार व असंतुष्ट-कुंठित बना देती है.
आज के विचार के अनुसार माना जाये तो घर की बिटिया को एक जिम्मेदार स्वस्थ नागरिक बनने की प्रक्रिया में यही से कमी आ जाती है.
सत्य है कि उसके मानवाधिकार का हनन भी शुरू हो जाता है.
पर इस सबके बीच हमें हमारे समाज के मूलभूत ढांचे के बारे में सोचना पड़ेगा व क्यों ऐसा हुआ है ,होता है या हो रहा है. क्यों ये असुरक्षा की भावना हमारे बीच इतनी बढ़ गई है ,जो सामाजिक परिवर्तन होने के बावजूद भी इतने पारिवारिक+सामाजिक बंधन हमारी नारी शक्ति के सामने खड़े हैं.
वास्तव में आवश्यकता है कि हमारे घर में बच्ची को उसके बचपन से ही मानसिक ही नहीं शारीरिक द्रष्टि से भी साहसिक प्रवृति का बनाया जाये. उसको पूरी वैचारिक स्वतंत्रता दी जाये.वो स्वयं अपनी बौद्धिक सामर्थ्य के अनुसार अपना सही निर्णय ले सकेगी .
अनेक तरीके हैं जिनके द्वारा वो अपने-आप को सुरक्षित रखने के साथ सावधान रख सकती है. सबसे बड़ी बात उसके मन में इस प्रकार का कोई भय न भरके उसे जागरूक और चैतन्य बनाया जाये .उसे अपने शरीर की प्राकृतिक संरचना के अनुसार क्या ध्यान व सावधानी रखनी चाहिए इसकी सही जानकारी दी जाये .
किन बातों व परिस्थितियों में निर्भय होकर संयम खोये बिना क्या कर सके. साथ ही अपने लिए बिना किसी के कहे उचित अनुचित की सीमा रेखा तय कर सकें. विशेषकर दिग्भ्रमित न हो. आत्मनिर्भर व योग्य शिक्षित होकर भी जरूरत पड़ने पर विवेक न खोकर अपनी रक्षा को सक्षम बने.
वैसे भी प्रेक्टिकल रूप से ये तो संभव ही नहीं है कि किसी बलात्कारी को या किसी हिंसात्मक व्यवहार को ,चाहे घरेलू हिंसा ही हो ,को कहीं रोका जा सके क्योंकि गलत या बलात हरकत करने वाले जरुरी नहीं है कि कही रास्ते में मिलें या रात को ही किसी भी उम्र की महिला या लड़कियों को मिलते हैं या मिलेंगे. यदि वो कही अकेली जाती है तो. ऐसे लोग तो अवसर देखते रहते हैं.
वे*घर-बाहर* कही भी ,कभी भी मिल सकते हैं.
कई उदाहरण सामने हैं कि *रक्षक भी भक्षक* बन जाते हैं.
वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है अपनी संपूर्ण सुरक्षा की पूर्ण चैतन्यता व जागरूकता+कानून सम्बन्धी जानकारी.
किसी भी बात की अधिक रोक-टोक लगाने के बदले नारी-शक्ति को किन्ही भी परिस्थितियों में अपनी सुरक्षा के लिए तैयार होना होगा ,साथ ही हमारे परिवार-समाज की युवतियों के साथ युवा शक्ति को भी सही दिशा-सही कार्यों की प्रेरणा मिलती रहे जो स्वयं आगे आकर इस तरह के कार्यों को रोकने के लिए अपनी पूरी सहभागिता प्रदान कर सकें.


अलका मधुसूदन पटेल ,*लेखिका-साहित्यकार*

Sunday, July 11, 2010

*गंभीर विचार*
पिछले कुछ दिनों से एक बिना मतलब की छीटाकशी या निरर्थक बातों-लेखन से कुछ लोग न केवल अपना समय व्यर्थ कर रहे हैं बल्कि अपनी ओर दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ये अनुचित *अति* कर रहे हैं ,जो उचित नहीं है.
यदि हमारी शक्ति अच्छे कार्यों-विचारों की तरफ जाये तो सही होगा.
सार्थक सोच या निरर्थक विचार
ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये ,अपना तन शीतल करे, औरों को सुख होए.
अक्सर हर बात या वस्तु के दो पहलू होते हैं. अच्छा-बुरा, गलत-सही ,आनंद-विषाद, सत्य-असत्य, समझदार-नासमझदार, हार-जीत, होशियार- बेवकूफ, जानबूझकर-अनजाने में, इसी तरह और भी बहुत हैं.
बुद्धिजीवी होकर भी कभी गलती हो जाती है और कभी अनजाने में अनचाही भूल कर बैठते हैं .पर जब जान-बूझकर कोई ऐसा काम लगातार किया जाये जो दूसरों के लिए अहितकर हो , वेदना देनेवाला हो, नीचा दिखाने या चिढाने के लिए हो या घरेलू हिंसात्मक(बोली) प्रवृति लिए हो. तो ये सर्वथा वर्जित है.
"सर्वप्रथम ऐसे कुछ गिने-चुने लोगों से सावधान रहें व अपना विवेक न खोएं क्योंकि उनका तो लेखन में या कार्यों में ऐसे कृतित्व से कोई वजन (वेट) ही नहीं है. वे अपने इन कुत्सित व गलत विचारों द्वारा दूसरों को केवल व्यग्र या क्रोधित करने की चेष्टा करते रहते हैं. ताकि उनपर दूसरे मनीषियों-माननीयों का ध्यान जाये. समझ लें ऐसे लोगों के पास वैचारिक शक्ति ही नहीं है कुछ अच्छा बोलने या सोचने की ,ध्यान न ही दें न कोई प्रतिक्रिया कभी भी जाहिर करें.
संभवतः उनको स्वान्तः सुखाय का आनंद मिलता हो ,त्याग कर दीजिये उनके निरर्थक शब्दों को.
कथन कटु हो सकता है पर सत्य है. थोडा सा ज्ञान हासिल करके आजकल बहुतायत लोग बुद्धिमानों की श्रेणी में शामिल होने की चाहत रखते हैं पर जानकारी के अभाव में निरर्थक बातों या कामों से जानबूझकर अपने को बड़ा(ज्यादा महत्वपूर्ण) दिखाने के लिए बिना कुछ सोचे ऐसा करने की कोशिश करते हैं ,शायद वे नहीं जानते कि ये उन्ही के लिए सही नहीं है.
महत्वपूर्ण - उनके पास सार्थक सोच ही नहीं होती वे ऐसा न मानें .हाँ निरर्थक विचार जो उनके मन में भरे पड़े हैं उसका उपयोग न करें .अपना मन-विचार श्रेष्ट कर्मों में लगायें ,तो न केवल उनका लेखन+ब्लॉग बल्कि जीवन भी सार्थक होगा. सभी उनको पढ़ना भी चाहेंगे. स्वयं अपने व अपनों की नज़रों में बहुत ऊँचा उठ पाएंगे. अपनी योग्यता-बौद्धिक क्षमता को सही दिशा में लगाकर निश्चय ही उत्क्रष्ट्ता की ओर बढ़ेंगे व अपनी बुद्धिमत्ता सही स्वरूप में साबित कर सकेंगे.
हमारे भारत की परंपरा-संस्कार ये नहीं सिखाते कि अनर्गल प्रलाप ,गलत-अविवेकपूर्ण *शब्दों- द्रश्यों* का प्रयोग हम किसी के लिए भी न करें या गलत सोचें. किसी भी बात को सही तरह से कहा जा सकता है व उसका असर ज्यादा रहकर महत्वपूर्ण बनता है.
अपनी भाषा व कार्यों में शाब्दिक गरिमा-गौरव बनाये रखकर ही हमें आपस में एक-दूसरे का सम्मान करना सीखना ही होगा.
ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये , अपना तन शीतल करे ओरों को सुख होए .
आपसी प्रतिद्वंदिता, एक दूसरे का भेद-भाव या नीचा दिखाने की कोशिश किये बिना क्यों न हम अपना ज्ञान, जानकारी, श्रेष्टता ,अनुभव सहयोग करें+बाटें. ज्ञातव्य है हमारे अधिकतर भाई-बहनें कर भी रहे हैं. परोक्ष-अपरोक्ष रूप में तो हम सब एक दूसरे से वैचारिक-मानसिक रूप में जुड़े हैं. विज्ञान के वरदान से इन्टरनेट बहुत अच्छा माध्यम बन चूका है. कुछ पहले समय तक तो हमें इतना बढ़िया मौका ही नहीं मिलता रहा है कि हम सब अपने विचार -मंतव्य आसानी से बाँट सकें.
संसार के अथाह ज्ञान सागर व मन की गहराई में तो जाने कितना विशाल भंडार -खजाना पड़ा है कि हम उसको सामूहिक समेटने व सामने लाने का प्रयास करें तो भी कम पड़ेगा पर हम सब कितने ऊँचाइयों तक पहुँच सकते हैं सोच नहींसकते.
कोई भी किसी से कम ज्यादा नहीं है ,आपस में ही होड़ लेने की आवश्यकता नहीं होती ,सभी अपने-अपने क्षेत्र-कार्य में सर्वश्रेष्ट हैं. हाँ एक-दूसरे की कमियों-बुराइयों-पिछड़ी-पिछली बातों पर ध्यान न देकर कुछ प्रशंसनीय प्रयास किया जाना चाहिए जो हमारी ही योग्यता को प्रदर्शित न करे बल्कि दूसरे लोगों के लिए प्रेरणा बने व हमें उन पर गर्व हो वे इसी के लिए प्रतिबद्ध रहें.
कबीर मन निर्मल भये जैसे गंगा नीर ,पाछे-पाछे हर फिरे कहत कबीर कबीर.
तात्पर्य हम अपना मन-दिमाग निर्मल-सही दिशा में रखें तो लोग स्वयं आपको पढना चाहेंगे.
“--हम सभी लेखकों-लेखिकाओं समूह के लिए हम सभी की ओर से- -“,
अलका मधुसूदन पटेल , *लेखिका -साहित्यकार*

Friday, June 18, 2010

झाँसी की रानी को श्रद्धांजलि

*ओ! बुंदेला भूमि जननी रख ले प्रदेश का पानी ,एक बार फिर से दे दे लक्ष्मीबाई सी रानी*
आज १८ जून को झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई की पुण्य तिथि है ,उनकी स्मृति में सारे भारतवर्ष की न सिर्फ महिला-शक्ति बल्कि हर भारतीय का मस्तक गर्व से ऊँचा होता है. हर नारी को झाँसी की रानी से प्रेरणा लेकर साहसी बनना है व आवश्यकता पड़ने पर विवेकपूर्ण निर्णय लेकर अपने कदम बिना किसी से डरे आगे बढ़ाना होगा. ज्ञातव्य है सदियों से ही हमारे देश की नारी ने बड़े से बड़े कार्य किये हैं ,वर्तमान में भी नारियों ने वैसे भी हर क्षेत्र में अपने परचम लहराने प्रारंभ कर दिए हैं लगभग हर जगह आगे आकर अपना लोहा मनवा रही हैं ,तो फिर किसी भी बात(समस्या) से न घबराकर अपनी गरिमा बनाये रखकर आगे बढते रहना है.
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई- नारी शक्ति के साहस व शौर्य का गुण-गान आज भी समस्त बुंदेलखंड के कण-कण में ही नहीं संपूर्ण भारतवर्ष के जन-मानस के रग-रग में व्याप्त है.जहाँ जाकर उनके बारे में जानकर हमारे मन में भी वैसा ही स्वाभिमान व एक अपूर्व शक्ति जाग्रत हो जाती है . हमें हमारी मानसिक व शारीरिक शक्ति चैतन्य करनी ही होगी.
*झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता प्रशस्ति विभिन्न स्वरूपों में*
प्रख्यात कवियों+साहित्यकारों ने उनको अपनी भावनात्मक श्रद्धांजलि अपने अलग-अलग रूप में प्रगट की है.
• श्रीयुत बाई लक्ष्मी शोभित त्रिविध स्वरुप ,सभा सरस्वती ,गृह रमा, युद्ध कालिका रूप.
तज कमलासन ,कर कमलासन,गहि रंग तलवार,कुल कमला काली गयी,झाँसी दुर्ग द्वार.
.--वियोगी हरि
• देश की गुलामी और नमक -हरामी इन दोनों से ही लक्ष्मी देश लक्ष्मी सी छली गई ,
आखिरी प्रणाम कर झाँसी को उसांसी भर, साथ कर सुरमों के एक थी अली गई,
विप्रधन श्याम हांकते ही रहे बांटें अरि , तकते ही रहे जन कौन सी गली गई,
बैरियों की भीर थी , हाथ शमसीर थी ,यों चीरती फिरंगियों को तीर सी छली गई.
घनश्यामदास पाण्डेय
• गर्दन पर गिर पड़ने वाली ,काँटों से कढ़ जानेवाली ,अरि की बोटी से चटख-चटख ,छोटी तक चढ़ जानेवाली '
छू गई कहीं पर किंचित भी,जिसको इनकी विष बुझी धार,विष चढ़ते ही गिर पढ़ते थे अरि एक-एक पर चार.
• प्रतिपल शोणित की प्यास थी,पर पानीदार कहती थी ,जिसके पानी से पानी में बेलाग आग लग जाती थी.
*लक्ष्मीबाई की सु स्मृति का गति हूँ अनुपम आव्हान ,खोजा करती हूँ दुर्गा की पदरज पावन पुण्य महान.*
*हम सभी महिला शक्ति की ओर से हमारी प्रेरणा झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को हम सबकी ओर से श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं .*
“उनकी शक्ति से अभिमंत्रित व विजित ” ,
कोमल है कमजोर नहीं ,शक्ति का नाम नारी है ,सबको जीवन देनेवाली मौत भी उससे हारी है.
इल्म ,हुनर, औ दिलोदिमाग में कहीं किसी से कम नहीं,वह तो अपने सारे अधिकारों की पूरी अधिकारी है.
बहुत हो चुका ये दुःख सहना अब इतिहास बदलना है ,नारी को अब कोई कह न पाए ये अबला बेचारी है.
*जय हो रानी लक्ष्मीबाई की , जय हो भारतीय नारी शक्ति की एकता की ,जयहिन्द*
*अलका मधुसूदन पटेल ,लेखिका -साहित्यकार*

Wednesday, March 24, 2010

*प्रयास से परिवर्तन संभव*
बहुधा हम अपने आस-पास गलत घटित ,लिखित,सुनी बातों या घटनाओं को पढकर-देखकर-सुनकर विचलित हो जाते हैं.
हम जितना आगे बढ़ते हैं उतने ही कुछ लोग पीछे लोग धकेलने की कोशिश करते हैं. चाहे वो ब्लोगर्स हों ,पेपर्स में हों, या किसी की बातें हालाँकि इनकी संख्या ऊँगली पर गिनने वालों की रहती है. ये वे लोग होते हैं जो कुंठित रहते हैं या अपने आप में असफल रहकर निराश रहते हैं , हम इनको *मानसिक विकलांग* कह सकते हैं ,जो दूसरों को पीड़ा पहुंचाकर खुश होते हैं. हालाँकि ऐसी ओछी मानसिकता वाले लोग हमारे ही घर या बाहर कहीं भी हो सकते हैं. ये कुछ लोग अपने आप को श्रेष्ट साबित करने का कितना भी दंभ भरें इसकी कोशिश में वे स्वयं निम्न विचारों के बन जातें हैं. "तो इनको नजरंदाज न करके इनपर पैनी निगाह तो रखें " साथ ही अपने हक या अधिकार के लिए सदैव आगे बढें. अपने संकीर्ण विचार त्यागकर ,अपनी आवाज बुलंदकर कोई जुल्म या अत्याचार न सहें पर अपने धैर्य का परित्याग कभी न करें ,निराश न हों सदैव आशावादी द्रष्टि रहे स्वनिर्णय लेने की क्षमता रहे. अपना आत्मसंयम-अनुशासन हमें बड़ी से बड़ी समस्या, विकट कठिनाइयों व विपरीत परिस्थितियों में भी हमें आसानी से विजय दिलाता है. बस योजनाबध्द तरीके से अपने कार्य को करें.
NEVERDOUBT THAT A SMALL GROUP OF THOUGHTFUL ,COMMITED CITIZENS CAN CHANGE THE WORLD .
INDEED ITS THE ONLY THING THAT EVER HAS.
वर्त्तमान समय में हमारी *नवयुवा पीढ़ी* स्वयं स्फुटित ज्योतिपुंज स्वरुप बनकर सशक्त हो रही है.
संपूर्ण चेतना से जागरूक ,चैतन्यशील व सुशिक्षित होकर अपना मार्ग निर्धारण करने का साहस बटोरकर निरंतर उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर होती जाती है.
जीवन के संघर्ष-कड़े रास्ते,कटु वचन-मानसिक या शारीरिक हिंसा भी उनको डिगा नहीं पाते बल्कि उत्क्रष्टता के मार्ग को प्रशस्त करते हैं . योग्यता व सफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ,सफलता के आकाश को विस्तृत करने के लिए अपनी योग्यता को निरंतर विकसित करते रहना आवश्यक है.
*बहुत विशाल होता है ख्वाहिशों का आसमां-----और उतना ही मुश्किल होता है ,हर इच्छा को साकार कर पाना ,लेकिन जब कुछ हासिल करने का जज्बा दिल में रहे नई राहें मिल जातीं हैं व मंजिलें करीब आ जातीं हैं आपके प्रयास से सफलता आपके कदम छूने को आतुर हो जाती है.*
हाँ निस्वार्थ भाव से हमें अपने भाई-बहिनों को भी पीछे न धकेलकर ,दुर्व्यवहार न कर उनकी योग्यता के अनुरूप सबको साथ लेकर सतत सहयोग को तत्पर होना होगा . हमारा प्रयास सार्थक होगा व जैसा परिवर्तन हम चाहते है अवश्य होगा .
समय के साथ बदलना होगा ,स्वाभिमानी-स्वावलंबी-साहसी बनने के लिए समर्पित -संकल्पित यज्ञ की प्रगति में सहायक होना है.
*इस अँधेरी रात को हरगिज मिटाना है हमें. इसलिए हर खेत से सूरज उगाना है हमें.*
अलका मधुसूदन पटेल
*लेखिका व साहित्यकार*

Tuesday, February 23, 2010

अपनी विशिष्टता का अहसास करके आत्मबल बढ़ाना होगा---आत्म-निर्भरता की ओर कदम बढ़ाने होंगे---
जब हमारा आत्मबल जाग्रत होता है तो दुनिया की समस्त शक्तियां छोटी पड़ जाती हैं .नारी-शक्ति को स्वयं इसका अहसास कराना होगा.
सदियों से महिलाऐं वैश्विक स्तर में भी समाज में हाशिये पर रही हैं. उनका सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक -भावनात्मक तरीके से मजबूरी व मासूमयित का फायदा उठाये जाता रहा है. उनको आधी दुनिया तो बोला जाता है पर उनको उनके मानव-अधिकारों तक से वंचित रखा जाता रहा है.
पर आज सामाजिक,सांस्कृतिक ,पारिवारिक मूल्यों में निरंतर चेतना बढ़ रही है, परिवेश बदल रहे हैं. वास्तव में समाज में भी कर्तव्यबोध की भावना बढ़ रही है धीरे-धीरे ही सही. पुरुष वर्ग के साथ मुख्यतः अब महिलाओं को भी अपना नजरिया बदलना होगा क्योंकि एक परिवार में वे ही मुख्य धूरी मानी जाती हैं . उनकी खुद की जिंदगी में वे जिस कमी ,भेदभाव,शोषण या ना-इंसाफी का शिकार हुईं हैं ,होती रही हैं . अपनी बेटी - बहू या समाज की हर बच्ची के साथ किसी भी भेद-भाव-भुलावे से मुक्त रखें. विशेष अपने घर में बेटी-बेटे में कोई भेदभाव नहीं करके समान अवसर दें. सही संस्कार व सामाजिक मूल्यों के साथ बचपन से ही बेटी को पूर्ण जागरूक व सशक्त बनाया जाये ना कि प्राकृतिक शारीरिक कमजोरी का अहसास कराके उसका मनोबल कम किया जाये. हर क्षेत्र में जागरूकता की बहुत जरुरत होती है.
अपने परिवार से ही शुरुआत करके व्यापक बदलाव करने होंगे. समाज के हर वर्ग के लिए इस समस्या के निदान ढूंढने होंगे.
वैसे भी सर्व-विदित है कि एक बेटी अपने परिवार से दूसरे परिवार में अपने को आत्मसात करने के बाद भी ( अपनी शादी के बाद) जुडी रहती है पूरा ध्यान रखती है. हाँ हमें अपनी बच्चियों को संपूर्ण सशक्त -सफल -अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता की पहल उसके जन्म से ही शुरू करनी होगी. जब तक हम स्वयं अपने घर में से ही हमारी बच्चियों का आत्मबल बढ़ाने का ध्यान नहीं रखेगे तो किसी जादुई चमत्कार की आशा दूसरे से नहीं कर सकते. अभी हमें बहुत कुछ करना बाकी है घरेलू हिंसा के साथ समाज में दिनों-दिन बढ़ते हिंसात्मक व्यवहार से अपनी व अपने परिवार की सुरक्षा किस तरह की जाये इसकी जानकारी हेतु वृहद उपाय किये जाने होंगे. घरेलू+कामकाजी महिलाओं को अपनी भूमिका सक्षम बनानी होगी ,अपनी बच्चियों को अधिक मूलभूत सुविधा दिलवाने के साथ सतत निगरानी के दायित्व भी निभाने होंगे व उन पर विश्वास करके उनके कर्तव्यों से परिचित कराना होगा ताकि वे किसी गलत लालच या मतिभ्रमित होने से बचें. और वे समाज-परिवार व अपनी जिंदगी में सामान्य संतुलन बनाकर निडर होकर अपना जीवन सार्थक सकें. अपनी बात कहने में हिचक महसूस ना करें.
बालिकाओं की प्रगति व उत्थान के लिए आन्दोलन का प्रारंभ नए तरीके से करना है तो बारम्बार अनेकों अत्याचार व दुर्घटनाओं से हम मात्र विचलित होकर नहीं रहेंगे.
श्रंखलाएं हों पगों में,गीत गति में है सृजन का ,
है कहाँ फुर्सत पलक को ,नीर बरसाते नयन का,
उठो आगे बढ़ो ,ये समय है कुछ कर दिखाने का.
जयहिंद-जय महिला-शक्ति.
अलका मधुसूदन पटेल ,लेखिका+साहित्यकार.

Monday, June 8, 2009

· (FOR HEADING OF ALL POSTS )
o *नई किरण की ओर*--------
· नवीन सहस्त्राब्दी की दहलीज पर आधुनिक भारत ने अपने कदम बढा लिए है. . संपूर्ण विश्व में हमारा देश एक अपूर्व शक्ति के साथ बढ़कर हर क्षेत्र में अपनी गौरवमयी उपलब्धियों पर गर्वान्वित है.. हमारे कर्त्तव्य-उत्तरदायित्व बढ़ गए हैं----तो हमारे देश की नारी-शक्ति क्यों पीछे रहे. जरूरत है उनको आगे लाने की,सहेजने की,मिलकर कदम बढ़ाने की,उनकी योग्यता परखकर उत्साहित करने की,उनका आत्मविश्वास बढ़ाने की. .हमें विश्वास है आपकी संवेदनशीलता पर ,मानवीय मूल्यों पर. . स्त्री-मुक्ति-मानवमुक्ति के संघर्ष में हम-आप साथ चलें......*और एक नए समाज का निर्माण करें*.

o *श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल* *स्वतंत्र लेखिका – साहित्यकार*
· सारांश----साहित्यिक जीवन परिचय
· स्वतंत्र लेखन - सामाजिक सेवा - अध्यापन ,पूर्व शिक्षिका - कोचिंग इंस्टिट्यूट .
· जन्म स्थान-सागर , वर्तमान आगरा , पति डॉ.एम.एस.पटेल ,राजकीय स्वास्थ्य सेवा उ.प्र.
· शिक्षा-स्कूलिंग- नेपानगर , स्नातकोत्तर "एम.एस सी. जीव शास्त्र" जबलपुर
· लेखकीय परिचय-1संपादन मासिकपत्रिका*पारमिता*-*2आर्टक्लब*संस्थापिका,साहित्य व विशेषविधा, झाँसी.
· नियमित लेखन - हिंदी व अंग्रेजी में .
· प्रकाशन प्रादेशिक, राष्ट्रीय स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं व अंतर्जाल पत्रिकाओं में..
· लगभग १५० कहानी ,लेख ,गीत ,परिचर्चा प्रकाशित-प्रकाशनाधीन.
· नियमित आकाशवाणी प्रसारण २५-३० झाँसी, छतरपुर - सी केबल टी. वी. ९-१०आगरा.
· प्रकाशित पुस्तकें- कहानी संग्रहों की.
· MEMBER OF INDIAN WRITERS CLUB
· INDIA INTER CONTINENTAL CULTURAL ASSOCIATION
· १.*लौट आओ तुम*-------२१ कथा संग्रह १९९८
· २. *मंजिलें अभी और हैं* - १८ कथा संग्रह २००३
· ३. प्रकाशनाधीन-१. ईश्वर का तो वरदान है बेटी २. १००१ हस्त शिल्प कला
· पुरस्कार--------लेखन - सामाजिक कार्यों
· अखिल भारतीय लेखन - *कहानी प्रतियोगिता* दिल्ली प्रेस पत्रिका.
· १.कहानी *बंद लिफाफों का रहस्य* पुरस्कृत २००१ में .प्रकाशन "गृह शोभा" २००२ .
· २.कहानी *दूध के दांत* पुरस्कृत २००३ में .प्रकाशन “सरिता” २००४ .
· पुरस्कृत - तत्कालीन राज्यपाल उ.प्र. महामहिम स्व. विष्णुकान्तजी शास्त्री द्वारा.
· ३. सरदार पटेल महिला कल्याण समिति-सामाजिक कार्यों ,नामांकन रोटरी क्लब द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर..
· ४. अन्य अनेकों संस्थाओं व स्थानीय प्रशासन-लेखन निबंध सामाजिक व लायंस क्लब्स पुरस्कार.
· ५.Police Services are Challenge for Public Expectations-
· awarded essay by S.S.P.Office Jhansi
· blog *gyaana*
· श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल
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·
· 1 . क्या है *घरेलू हिंसा-डोमेस्टिक वायोलेंस. ?*
· परिवार में जब किसी बालिका ,महिला,पुरुष या घर के "किसी भी उम्र" के किसी सदस्य के साथ घर के ही लोग हिंसा का या असामान्य ,गलत व्यवहार ,मारपीटकरना,डराना,धमकाना, छीना झपटी हत्या आदि अमानवीय बर्ताव करते हैं.तो उसे *घरेलू हिंसा* या *डोमेस्टिक वायोलेंस* कहते हैं .नैसर्गिक कोमल शारीरिक प्रकृति व स्वरुप होने के कारण ज्यादातर लड़कियों व महिलाओं के जीवन के हर पहलू में किसी न किसी प्रकार की हिंसा होती ही रहती है. यह हिंसा बलप्रयोग ,शारीरिक ,लैंगिक,यौन हिंसा , भावनात्मक ,मनोवैज्ञानिक आदि सभी रूप से विद्यमान हैं. हिंसा का डर,भय, खौफ औरत की मजबूरी बन जाता है. व पुरुष वर्ग व बलशाली लोगों का नियंत्रण उसपर बना रहता है. उसका "लड़की" के रूप में पैदा होना ही उसको हिंसा का शिकार बना देता है. कोख में बच्ची को मार देना या फिर पैदा होने के बाद उसे ठीक से खाना ना देना ,डॉक्टर द्वारा सही इलाज ना करना ,अच्छे स्कूल में ना पढाना व उच्च शिक्षित ना कराना,कम उम्र में ही शादी कर देना. नकारात्मक सहयोग ,पुत्र-पुत्री के बीच असमानता-भेदभाव का बर्ताव, आर्थिक निर्भरता का ये पारिवारिक व सामाजिक भेदभाव बचपन से लड़की के मन में हीन भाव भर देता है,उसको पनपने नहीं देता.बचपन से उसके उठने ,बैठने ,आने-जाने पर लगाई गई रोक उसे मानसिक कमजोर बना देते हैं.ये सीमाएं शादी के बाद भी परम्पराओं व रीति -रिवाजों की आड़ में बंधन के रूप में उसको जकड कर रखते हैं. इस सब के साथ शारीरिक स्वरुप में कोमल होने के कारण आदमी या घर के लोग उसपर हावी हो जाते हैं व उसपर घरेलू हिंसा करने लगते हैं. पति या उसके परिवारजन उसके साथ दुर्व्यवहार ,दुर्भावना,मारपीट,गली-गलौज,मानसिक शारीरिक प्रताड़ना ,यौन हिंसा अदि होती है.अक्सर भारतीय समाज ने औरतों की पवित्रता को घर समाज जाति की प्रतिष्टा का मोहरा बना लिया है. *उचित संरक्षण* सही है वह सम्मान के साथ चाहती भी है पर अनावश्यक परतंत्रता नहीं ,उसका हक़,उसके अवसर न छीने जाये. पुत्र की तरह उसका भी संपूर्ण मानसिक विकास+शिक्षा होना जरुरी है.
· "आश्चर्यजनक रूप से घरेलूहिंसा में पारिवारिक महिलाओं की ही महिलाओं के प्रति भागीदारी बराबर है."
· पहिले अपने जन्म लिए घर में व ब्याह के बाद पति के घर में भी अक्सर घरेलू हिंसा द्रष्टिगत होती है.
· विशेष------*सामाजिक हिंसा* में भी औरतों या बालिकाओं के साथ असामान्य व्यवहार ,बलात्कार,जबरदस्ती यौनिक छेड़ छाड व बल हिंसा देखने को मिल जाती है. यां उत्पीडन का मतलब है किसी भी औरत को बुरी नजर से घूरना,सीटी बजाना ,गंदे गाना,भद्दी अश्लील बातें, मजाक या जानबूझकर शारीरिक संपर्क की चेष्टा.महिलाओं के लिए आपत्तिजनक कहना ही नहीं गलत शब्दों में लिखना तक हिंसा कहलाता है.
§ *अलका मधुसूदन पटेल*
· 2. *बालिकाओं व महिलाओं के विरुद्ध भेद भाव *
· बच्चियों व स्त्रियों के साथ पैदा होने से वृद्धा होने तक निरंतर दुर्व्यवहार इसीलिए होता है की उसने लड़की के रूप में जन्म लिया है. *वीकर सेक्स* या *कमजोर* कहकर उसका उपहास या निम्न श्रेणी का बर्ताव होता आया है. भारतवर्ष ही नहीं संपूर्ण विश्व में *मानव अधिकारों का हनन* का इससे बड़ा कोई उदाहरण नहीं है. इक्कीसवीं शताब्दी में कदम रखने के बाद भी समाज की अधिकतर संस्कृतियाँ ,जातियां,अधिकांश देशों की सभ्यता में नारी शक्ति के साथ असमानता का व्यवहार होता है..शैक्षिक स्तर,आर्थिक निर्भरता,,अल्प राजनीतिक अधिकार ,बच्चों को जन्म देने का निर्णय ,उसकी स्वतंत्रता का सदा उसपर अभाव समान रूप से बना रहता है. पारिवारिक ,सामाजिक व कानून सम्बन्धी असमानता उस पर थोपी जाती है. उसको जकड कर रखा जाता है. यह भी एक प्रकार की भेद भाव की भावनात्मक हिंसा या असमानता है जो उसको बेडी में बांध कर रखती है."महिला पर महिला द्वारा हिंसा का सब जगह उल्लेख करना आवश्यक है क्योंकि ये भेदभाव घर में ही ज्यादा होते हैं ."
· विशेष-----बालिकाओं व महिलाओं के विरुद्ध उनके घर से ही भेद ,असमानता व हिंसा किसी भी रूप में प्रारम्भ हो जाती है ,पर इसे व्यक्तिगत तौर पर या सजा - दंड देकर कदापि नहीं रोका जा सकता. समाज में व्याप्त धारणाओं ,विचारों को बदलकर ही इस समस्या को दूर किया जा सकता है. समाज में जनता को जागरूक करने के लिए एक मुहिम छेड़नी पड़ेगी ,जंग लड़नी पड़ेगी. पूर्वाग्रहों व अंधविश्वासों की ,झूठी परम्पराओं की जड़ें इतनी गहरी बैठ गई हैं कि अनजाने में ही महिलाओं को पुरुष से नीचा समझा जाने लगा है.स्वयं औरत ने ही अपने आप को छोटा मान लिया है. क्योंकि वह जानती है कि शारीरिक स्वरुप में वो कमजोर है व उसपर संसार का सबसे बड़ा भार संतति का है पर ये तो प्रकृति का वरदान है कोई अभिशाप नहीं. और उसकी शारीरिक कमजोरी के कारण ही उसे हर उम्र में सदैव अपने "पिता,पति, पुत्र, सही मित्र" के रूप में संरक्षक की आवश्यकता होती है. जिन पर वह सदैव गर्व भी करती है .पर अनुचित बल प्रयोग न करके उसे मानसिक रूप से स्वतंत्र कर आगे बढने देने का पूरा हक़ मिलना चाहिए .उसमे पूरी योग्यता है यह उसको जानना होगा. अगर सही मौका मिले तो. कोई कन्या या महिला जब समाज में अपना एक ऊँचा स्थान बना लेगी तब उसके साथ होने वाला हिंसात्मक रवैया एक चौकानेवाला हादसा बन जायेगा. वर्तमान में नवीन पढ़ी लिखी युवा पीढी में नई चेतना व जागरूकता के द्वारा बदलाव की बयार लाई जा सकती है.संपूर्ण चैतन्यता लाने के लिए उनको उनके मौलिक व बुनियादी अधिकारों की जानकारी देकर जाग्रत करना होगा विचारों में बदलाव लाकर नई अलख जगाकर सामूहिक प्रयास करना होगा .
· ये प्रश्न ज्यादा *महत्वपूर्ण-ज्वलंत* इसीलिए भी हो जाता है कि बचपन से हर जगह अपने विरुद्ध लगातार हिंसा देखकर नवयुवा लड़की विशेषकर "नवयुवती कही अधिक विद्रोही बनती जाती है. अपना अच्छा बुरा न सोचकर "गलत राह अपनाने को बढने लगी है" ये परिवार व समाज के लिए बहुत चिंता की बात है.
· "अतः सही मार्गदर्शन होने से व घरेलू हिंसा में रोक व पारिवारिक भेद भाव मिटाने के साथ परिवारों में उसके साथ सही व्यवहार+ सम्मान किया जाये. "नारी शक्ति के बिना तो संसार चक्र ही नहीं चल सकता और उसी के साथ ये नकारात्मक व्यवहार." सशक्त समाज का निर्माण हम सब को ही करना होगा जहाँ कोई भेद भाव न हो. यही आज की सबसे बड़ी जरूरत है. जिसमे सब एक दूसरे का पूरा उचित मान सम्मान देकर अपने अधिकारों की रक्षा करें न ही अपने पथ से भटक कर दिशाहीन हों . *अलका मधुसूदन पटेल*


· 3 ..................*गंभीर चिंतन*...................
· आवश्यकता है जागरूक व सावधान समाज प्रहरियों की .चुनौती है स्वदेशवासियों को.
· हमारे देश की आज़ादी के पचास वर्षों के बाद भी इस वैज्ञानिक व आधुनिक युग में नारी की ये अमानवीय स्थिति जो सामान्यतः द्रष्टिगत नहीं होती .कई जगह आज भी मौजूद है. इन परिस्थितियों को दूर करने के उपाय ढूँढना है.सदियों से चली आ रही रुढियों व पुरानी सोच को बदलना है. दिशा व दशा को परिवर्तित करनी है
· स्वास्थ्य विभाग के (पूर्व)सर्वेक्षण की जानकारी से उपलब्ध आंकड़े संक्षिप्त में प्रस्तुत हैं.
· क्या यह आप जानते हैं........(जबकि यह सब कानूनन अपराध है. )
· १ भ्रूण व शिशु हत्या ,भारत में प्रत्येक वर्ष ३० से ५० लाख शिशु कन्या भ्रूण नष्ट किये जाते हैं .
· २. प्रत्येक वर्ष जन्म लेते ही १०,००० कन्या शिशुओं को मार डाला जाता है. आधुनिक समाज में भी अलग-अलग प्रान्तों में इस असंवेदनशील कृत्य की सूरत अलग अलग है.कही कम कहीं ज्यादा.
· ३.कई जगहों पर कन्या को जन्म नहीं लेने दिया जाता. कई जगहों पर कन्या के पैदा होने के बाद उससे भेदभाव करके माँ का दूध व पर्याप्त पोष्टिक भोजन नहीं दिया जाता इससे कुपोषण होने से वो कभी कमजोर तो कभी उसकी म्रत्यु हो जाती है. घर की महिलाओं का ही अपनी बेटी से असमानता व दुर्व्यवहार होता है.
· इस तरह के अनेक कारणों से भारत की जनसँख्या में ५ करोड़ महिलाऐं कम हो चुकीं हैं.
· पुरुष-स्त्री का अनुपात १०००/ ८७२ से ९०० तक आगया है. जिसमे अभी भी सुधार नहीं है.
· ४. मनोचिकित्सक सुधीर कक्कड़ के अनुसार ६००,००० से ७००,००० भारतीय बच्चे यौन हिंसा के शिकार बन जाते हैं. अधिकांशतः परिवार के अंदर ये अपराध होता है जो द्रष्टिगत नहीं होता.
· ५. प्रत्येक दर्ज एक अपराध के पीछे १०० बिना दर्ज किये अपराध रहते हैं.पिछले १० वर्षों में १० वर्ष से कम आयु की बालिकाओं के साथ बलात्कार की घटना में २७% की वृद्धी हुई है. ६५% घरेलू अपराध के मुक़दमे पुलिस में दर्ज होते हैं. घरों में होने वाले अपराध ज्यादा होता हैं आश्चर्य जनक रूप से महिलाओं की भागीदारी सामान होती है.
· ६.बंगलोर,मुंबई,चेन्नई,हैदराबाद,दिल्ली,कलकत्ता में ७०,००० से १००,००० के करीब वैश्याएँ थीं. जिनमे १५% जबरदस्ती बनाईं गई लड़कियों की संख्या थी. प्रतिवर्ष किसी भी रूप में २० से २३ लाख औरतों की खरीद-फरोख होती है.२५% बच्चियां होती हैं .
· ७. ग्रामीण क्षेत्रों में ४०% लड़कियों का विवाह १५-१६ वर्ष से कम आयु में हो जाता है.राजस्थान में ५६% का १५ वर्ष से कम,१४% का १० वर्ष से कम व ३% का ५ वर्ष से कम होता है. प्रान्तों के अनुसार आंकडा अलग है.
· अधिकांशतः किशोरवय की बालिका प्रथम संतान की माँ बन जातीं हैं. कम आयु में माँ बनने व जानकारी के अभाव में माँ की म्रत्युदर ज्यादा है. भारत में १००,००० में से जन्म लेने वाले बच्चों ४५० की माँ म्रत्यु दर है.
· बच्चों व माँ की इस दर की गिनती पक्की नहीं है.
· ८.७०% महिलाऐं पति व उसके परिवारवालों की हिंसा की शिकार .प्रतिवर्ष १५००० महिलाऐं दहेज़ हत्या की शिकार.
· ९ .गर्भवती महिला के साथ मारपीट ,विधवाओं के साथ दुर्व्यवहार ,संपत्ति के लिए हत्या.प्रतिवर्ष लगभग १५००० विधवाएं परिजनों द्वारा निराश्रित ,असुरक्षित,आश्रमों में यौन हिंसा की शिकार.
· १०.हर ३४ मिनिट में एक महिला बलात्कार की शिकार,हर २६ मिनिट में एक महिला छेडछाड़ की शिकार. प्रस्तुति *श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल*
· ४. *स्वनिर्माण चेतना एवं जागरूकता-------बालिका के हितों की रक्षा*
· स्वप्न भारत की प्रगति का बालिका कर पायेगी , सृजन सेवा संगठन अब महिला कर जायेगी.. . प्रगति की निर्मल पताका शक्ति संचित भोर का, सूर्य ऊंचाइयों का बनाकर रोशनी वही फैलाएगी ..
· ईश्वर की सर्वश्रेष्ट कृति मानव ,मानव में श्रेष्ट स्त्री ,सारी दुनिया की सृजक, पालक, कला, संस्कृति, सर्वगुणा शक्तिमान ,समरूपा, ममतामयी और न जाने कितनी उपाधियों से परिपूर्ण है नारी शक्ति. नई दुनिया की स्रष्टिकर्ता आज सिर्फ संघर्ष का पर्याय बनकर क्यों रह गई है..आज जरूरत है बालिका-महिला को अपने को पहचानने की. स्वयं अपने नवनिर्माण हेतु चैतन्य होने की. अपने में आत्म-विश्वास, संपूर्ण आस्था जगाने की. अपने समुचित विकास एवं अधिकारों के लिए उसे सम्पूर्णता से अपने जनतांत्रिक देश में आवाज ही नहीं देना है सक्षम बनकर सही राह चुनना है. नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ना है धरती पर कदम जमाकर अपने आकाश को पाना है.. नित्य नवीन चुनौतियाँ ,भीषण समस्याएँ, स्वयं अपने परिवार, समाज की विसंगतियां ,नित नई कठिनाइयाँ ,प्रतिकूल बाधाए-अवरोध ,परिस्थितिवश अनावश्यक अनवरत शारीरिक-मानसिक शोषण-दोहन-तनाव उसके सामने हैं. पल-पल अन्धविश्वास,कुप्रथाएँ,अशिक्षा,अत्याचार जन्म से मृत्यु तक उसको चुनौती दे रहे हैं.. आधुनिकता के आवरण में भी उसको अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं .. इन सबसे जूझती *नारी* को अपने लिए सोचने-जाग्रत होने का समय कहाँ रह गया है पर--कवि का कथन है..
· संघर्ष तो करना होगा,जूझना होगा,ज्योतिर्मय संसार बनाना होगा.. नहीं है कोई उपाय ,संघर्षों-कष्टों से बचने का,सत्य से हटने का.
· सही के लिए तो अब आगे बढना होगा अंतिम स्वास तक मिटना होगा.यह नियति नहीं प्रगति है नवीन पथ की परिणति है.
· वर्जनाएं सदा रोकेंगी तुम्हारा पथ ,अवरुद्ध करेंगी तुम्हारा रथ.तुम ठहरना मत,घबराना मत,बढते जाना लड़ते जाना हर बाधा से, प्रतिबाधा से . जीवन बनेगा संघर्ष तभी होगा तुम्हारा उत्कर्ष.
· बंधी-बंधाई लीक से हटकर कुछ अलग सोचो ,बदलो. समझना होगा कि कोई चमत्कार नहीं होनेवाला, संवेदनाओं या सहानुभूतियों का ज्वार नहीं आनेवाला, स्वयं प्रबुद्ध बनकर आत्म-संयमित होकर समाज के दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब निहारकर नारी अधिकारिक चेतना जगानी होगी. छोटे-छोटे प्रयत्नों से बड़े-बड़े काम होते हैं. अपनी *संस्कृति-संस्कारों* को धरोहर मानकर समस्त *मिथ्या आवरणों* को दूर करके अपने अस्तित्व की लडाई खुद लड़नी होगी. शोषण, उत्पीडन, हिंसा से अपनी रक्षा के कदम बढाने होंगे. सामुदायिक जीवन में मिलकर आवाज उठाने से आत्मबल बढ़ने के साथ जनबल भी मजबूत होता है.. न केवल परिजन,समाज के बुद्धिजीवी भी आगे सहायतार्थ एकत्रित होते जाते हैं.. महिलाओं के अंतःकरण की सच्ची सोच उसके आत्मविश्वास के साथ समाज को सद्-प्रेरणा देते हैं.सामाजिक सुरक्षा मिलने से उसकी भावनाएँ ,आकान्शाएँ कुचल नहीं पाएँगी, उसे नहीं कहना पड़ेगा.(भ्रूण हत्या पर रोक हेतु)
· शक्तिदायिनी - शक्तिरूपिणी शक्ति मांग रही है, जीवन देने वाली जननी जीवन मांग रही है.. . कल्याणी दुःख-हारिणी तारिणी जग हननी क्यों है ? जग जननी,जग सृजनकारिणी दुःखदायिनी क्यों है?
· *विशेष*-नए भविष्य की सिर्फ कल्पना करने या बातें करने से कुछ नहीं होगा .इस कठोरतम यज्ञ को संकल्पित करने हेतु समग्र परिवार ,समाज,व देश के प्रबुद्ध नागरिकों को आगे आना होगा. शुरुआत भी अपने घर से, अपने परिवार से हर स्त्री - पुरुष को करना होगा.स्त्री शक्ति का सही मूल्यांकन करना होगा.. सोचना होगा बालिका के हितों की रक्षा खुद अपनी रक्षा है.
· *अलका मधुसूदन पटेल*
· 5 *परिवार व समाज की सशक्त भूमिका व प्रयास *(AWARENESS)-*स्नेहिल आव्हान है बिटिया का*.
· बालिका के प्रति समाज में रहने वाला हर व्यक्ति *स्त्री हो या पुरुष* अगर अपनी सोच और मानसिकता में थोडा भी परिवर्तन ले आये तो अपने आप जन-मन का रुख बदल जायेगा वह स्वतः नवनिर्माण की ओर बढेगी. आप अपने -लाड-दुलार-प्यार-पालन-पोषण में कोई कमी नहीं करते तो उसके भविष्य उज्जवलता में भी सहायक बनें.
· १ जिम्मेदार नागरिक व विकास प्रेरक के रूप में लिंग निर्धारण - भ्रूण हत्या के अपराध में न तो शामिल हों, न होने दें. अपने आस-पास के लोगों को भी रोकें. वर्त्तमान की असंतुलन की ओर बढती परिस्थिति सबके समक्ष है.. लड़कियों की कमी से क्या हमारे बेटों के ब्याह संभव होंगे ,स्रष्टि का संतुलन बना रहेगा.महिलाऐं अपनी बेटी को जन्म अवश्य लेने दें.
· माँ तेरे हाथों मेरा जीवन ,दे प्राणों का दान ,शिक्षारूपी पंख लगा दे भरूं गगन में उडान .
· चहक-चहक कर उडूं गगन में चाँद सितारे लाऊ उजियारी फैलाउंगी *माँ मत ले मेरे प्राण*.
· २ हमारे परिवार समाज में लड़के व लड़कियों में कोई भेद भाव न करें ,उनके अधिकारों से उनको वंचित न करें.. पुत्र के बराबर पुत्री भी माँ-पिता के साथ उनकी देखभाल-संभाल को हर क्षण तैयार है.समाज में आप देख रहे हैं.
· आपकी सर्वगुण सम्पन्न बेटी के लिए उसकी योग्यता ही उज्जवलता है ,जहाँ बिना किसी खर्च(तात्पर्य दहेज़ से है) के लोग उसे अपने परिवार की बहू बनाने में गौरवान्वित होंगे, स्वयं हाथ मांगने आयेंगे..
· ३. बालिका की किसी भी सामाजिक या घरेलू समस्या या जरुरत के प्रति उदासीन न रहें ,आंखें बंद न करें. पुत्र की तुलना में पुत्री को जनम देने में,बड़ा करने में *क्या आपने उतने ही कष्ट नहीं उठाये* फिर ये भेद क्यों?.
· ४.क्या केवल कानून बनाकर हम बाहरी व घरेलू हिंसा, असमानता या बलात्कार- दुर्व्यवहार आदि को रोक सकते हैं. बच्चियों को समुचित जानकारी व सावधान करने की जरूरत है ताकि वे दिग्भ्रमित न हों ,आपसे खुलकर बात कर सकें. आप के संपूर्ण स्नेह-विश्वास सहारे की जरुरत है उनको. .
· ५. शिक्षा के स्तर में शीघ्र व पूरी जागरूकता हो. उनकी रूचि के अनुसार उनको समुचित मौका दें. अनेकों उदा.सामने हैं पुत्रियों ने अपना जीवन अपने माँ-पिता-परिवार हेतु अर्पित किया है. अपनी शादी तक नहीं होने दी. ६.प्रशासन व सरकार द्वारा दी गई आर्थिक-शैक्षिक-आरक्षित सहायता ,मानसिक व शारीरिक विकास हेतु दी गई सुविधाओं की पर्याप्त जानकारी व संपूर्ण अवसर दें.
· दिल के ख्यालों में अब तेरी ही रोशनी है, अँधेरी जिंदगी से दूर ये सच्चाई की रोशनी है..
· रोशनी के ये दायरे कभी ज्ञान ,कभी ख़ुशी, कभी ज्योति बांटे, हम तुम्हारी ही अपनी हैं..
· ७. सामाजिक सस्थाएं अपने स्तर से नुक्कड़ नाटक,गीत,परिचर्चा,सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रदर्शनी गोष्टी आदि से जागरूक करने हेतु आगे आयें. सबसे बड़ा दायित्व इन्ही का है अपनी धरोहर की उन्नति के प्रयास का.. ८. मीडिया ,रेडियो, टेलिविज़न ,सिनेमा, इन्टरनेट आदि का भी समाज पर ,जनता पर बहुत व्यापक व त्वरित प्रभाव होता है इनको भी अपनी भूमिका सशक्त करनी होगी. क्योंकि इनकी आवाज समाज के हर परिक्षेत्र में पहुचती है.. ९ .बच्चियों-महिलाओंपर सदा अपना फैसला न थोपें. आर्थिक स्तर के लिए सही शिक्षा से आत्मनिर्भर ,स्वावलंबी बनाने को सदैव प्राथमिकता दें. उसकी योग्यता पर आपको गर्व होगा. पहिले वो आपकी सेवा को ही तत्पर होगी. समुचित लालन-पालन ,चिकित्सा,सही जीवन निर्धारित करने से वो स्वस्थ-सशक्त होगी.संघर्षों से जूझने को तत्पर.. १० हमारे स्नेही युवाओं को भी आगे आना होगा और भावी असंतुलन की ओर जाती *उनकी पीढी* की रक्षा उनको तत्परता से करनी होगी ,समाज की दूषित बुराइयों को वे अपनी योग्यता-सक्षमता-सूझ-बूझ से दूर कर सकते हैं. .
· ११. हम अपनी बेटी,बहन,माँ व घर की हर महिला का सम्मान करेंगे तो किसी और की कोई हिम्मत ही नहीं होगी कि कोई आँख उठाकर भी देख सके. सामाजिक चैतन्यता आने से हम यूँ विचलित नहीं होंगे. इन परिस्थितियों को बदलना ही होगा. *हमारी बेटियों के लिए हमें ये जंग सामूहिक लड़नी ही है*..
· नाम सरस्वती दिया, जिसे वो कन्या पढ़ न पाई, लक्ष्मी धू-धू जली ,दहेज़ के दानव से लड़ न पाई. . अन्नपूर्णा मांग रही , दो दाने भीख में दे दो. सीता चीख रही इस जग में इज्ज़त मुझको बख्शो.
· विशेष ----हमारे समाज के उन क्षेत्रों में ज्यादा ध्यान देने व अपनी आवाज पहुँचाने की जरूरत होगी जहाँ उपरोक्त सुविधाएँ व संसाधन उपलब्ध नहीं हैं .ग्रामीण क्षेत्र, पिछडे इलाके, मजदूर वर्ग के बीच जाकर जागरूकता लानी होगी.
· *WE SHOULD LIGHT A LAMP IN EACH DARK PLACE OF SOCIETY*
· *अलका मधुसूदन पटेल *-* gyaana blog*

· ६ * सामाजिक बदलाव की बयार*---*महिलाओं की आगे कदम----- बढाती दुनिया*
· “छोटे-छोटे प्रयास भी रंग ला रहे हैं धीरे धीरे ही सही, जानते हैं हम.”'
· LITTLE DROPS OF WATER ,LITTLE GRAINS OF SAND.
· CAN MAKE THE MIGHTY OCEAN & THE PLEASANT LAND;
· भारतवर्ष में कई भाषाएँ जाति धर्मं हैं पर निःसंदेह महिलाओं के प्रति सभी जगह सामाजिक परिक्षेत्रों में बहुत अधिक बदलाव दिखता है,सामाजिक सरोकार बदल गए हैं. उनके प्रति सामाजिक द्रष्टिकोण में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ है उनके प्रति नजरिया बदल रहा है.परिवारों में पुत्र-पुत्री में भेद-भाव नहीं के बराबर हैं. समान अवसर,प्यार,सम्मान भी मिल रहे हैं. पहिले जहाँ उनका घर से बाहर निकलना ही अच्छा नहीं माना जाता था ,शिक्षा के लिए संसाधन व क्षेत्र बहुत कम उपलब्ध होते थे. वर्त्तमान में अधिकांश शिक्षा संस्थाएं महिला शक्ति को आगे बढने को प्रेरित व आमंत्रित करती हैं. आज उच्च शिक्षिता का समाज में दबदबा है.स्वावलंबी महिलाओं को परिवार के साथ समाज में भी इज्ज़त से देखा जाता है.आज की नारी अपनी बात गर्व से कहने का साहस कर सकती है. पुरुष वर्ग के साथ कंधे मिलाकर चल रही है उनके समकक्ष अधिकार प्राप्त कर रही है अपना फैसला ,इच्छा व महत्वाकांक्षा कहीं ज्यादा आत्मविश्वास व बेबाकी से पेश कर रही है.पारिवारिक उत्पीडन या सामाजिक अन्याय के विरुद्ध उठ खडी हुई है..
· एक टहनी एक पतवार बनती है ,एक कोयला एक अंगार बनती है..
· मारते हैं एक ठोकर एक रोड़ा समझकर,वही मिटटी एक मीनार बनती है. ..
· स्वयं का मामला हो या परिवार का ,मूक तमाशबीन न रहकर निर्णायक भूमिका निभा रही है. आर्थिक आत्म-निर्भरता बढने से उनमे आत्म-विश्वास .अधिकारों के प्रति जागरूक-सचेत. यही नहीं पुरुष-पित्रसत्ता प्रधान भारतीय समाज की परम्पराओं-अंध-विश्वासों-रूढिगत विचारों का विरोध जता रहीं हैं.व्यक्तित्व विकास की और अग्रसर हैं.सिर्फ कामकाजी ही नहीं,घरेलू ,ग्रामीण महिलाऐं भी मुखर हो चलीं हैं.
· पर कहीं विद्रोह भी पनप रहा है क्योंकि नए दौर के इस युग में भी महिलाओं को बहुत मानसिक दबाव सहना पड़ रहा है. पुरुष वर्ग के साथ घर की महिलाओं को भी महिलाओं के प्रति अपनी अपने प्राचीन नजरिये में बदलाव लाना होगा. उन पर वर्चस्व स्थापित करने के बदले उनका पूरक बनना होगा तो समाज की बेहतरी हो सकती है.
· *नए ज़माने के ऐ दोस्त, हौसला रख ,दिशाओं का रुख बदल दे.*
· *भटकाव से बचाव व सावधानियां*
· आज की नारी आधुनिकता व पाश्चात्यता की अंधी दौड़ में ,आर्थिक स्वतंत्रता व सुविधाओं की मदहोशी में गुमराह भी होती जाती है. साजिशों को समझना नहीं चाहती.मतलबी-स्वार्थी होकर अपने भी उसके लिए पराये होते जाते हैं. परिवारों का संरक्षण ,स्नेहिल वातावरण को नकार के एकल परिवार का स्वातंत्र्य जीवन रास आ रहा है. चाटुकारिता ,भेद,रंजिशें, घमंड, विद्रोह,उद्दंडता,अनुशासनहीनता आदि बुरी आदतें भी अपना रही है. अपनी संस्कृति ,अस्मिता और गौरवमयी मर्यादा को भूलने में गर्व महसूस कर रही है.
· कृत्रिम फेशन के लिए अपनी लाज-शर्म को दांव पर लगाने से उसे परहेज करना ही होगा. गलत धारणा बदलनी होगी की अमर्यादित कपडे पहनने से या अति-आधुनिका बनने से उन्नति जल्दी होगी.
· छलावे से बचकर अपनी शील मर्यादा बनाये रखने से स्वाभाविक अपराध कम होंगे.
· नारी शक्ति *अँधेरे के मार्ग में न भटककर "उजाले के स्वागत" में पंख लगाकर उड़ना है. विश्वास करे सामाजिक क्रांति आने के साथ उसके बदलाव को स्वतः नई दिशा ,खुले मन व वरद हस्त से मिलेगी.
· वरिष्ट कवियत्री ने कहा है --,
· पाश्चात्य विचार की नयी सदी ,शताब्दी है
· नई -नई आशाएं हैं ,कई -कई अपेक्षाएं हैं
· हमें अपनी जमीन पर आस्था विश्वास बना रहे
· वृद्ध चरणों में नत होने का गौरव बोध बना रहे .
· दायित्व भी हैं ,धरोहर भी, सौहाद्र भी हैं ,संस्कार भी, .
· करना होगा हमें इनसे भी प्यार, अपनी जमीन पर ही रहकर,.
· हमारे घर परिवार का भी,और बुजुर्गों का पूरा सत्कार .

· *अलका मधुसूदन पटेल *-* gyaana ब्लॉग*7
· *हमारे संकल्प ही सुनहरे नए कल का आधार हैं *……………………
· *न चाँद तारे तोड़ने की चाहत है हमारी,न आसमां को अपनी मुट्ठी में समेटने की हसरत.. . एक इन्सां बनकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश, मुकम्मल बनाना है अरमान की ताकत .
· भारतीय महिलाओं ने अंतरिक्ष की उंचाईयों को छू लिया है. जमीं के हर क्षेत्र में अपने परचम लहरा दिए हैं.अपने देश सहित सारा विश्व चमत्कृत है. शिक्षा विज्ञान ,चिकित्सा, इंजिनियर ,टेक्निकली बड़े बड़े उद्योग-बिसिनेस वुमन, आर्टिस्ट, साहित्य,लेखक ,सरकारी- गैर सरकारी अधिकारी,आर्थिक,सामाजिक,राजनितिक,ग्राम-शहर कही भी-कोई भी क्षेत्र उनसे अछूता नहीं है. विचारणीय है कि इनकी संख्या इतनी कम क्यों है ? आबादी में महिलाओं का हिस्सा आधा माना जाता है फिर ये मुट्ठी भर क्यों ? अंतर्तम से पूछिये ,क्या आप को नहीं लगता की आप या हमारे परिवार की बालिका-महिला भी ऐसी बुलंदियों को छुए… सोचना है हम कैसे अपनी उन बहिनों के अधिकार दिलवा पाएंगे जो इतनी घुटन में रहती है कि उनको तो खुली हवा में साँस लेना भी मुश्किल है. . जन धारणा है कि बालिकाएं या महिलाऐं खुद अपनी लडाई लड़ें पर कैसे ? अपने ही लोगो से वे कैसे विद्रोह करें.अपने सन्सकारों से वे सुसंस्कृत हैं, क्या उनके अधिकार ,कानूनी संरक्षण,उनके लिए मिलने वाली सुविधाएँ सब तरह की जानकारी उन तक पहुचने का बीडा समाज के हर पुरुष-महिला-युवा-बच्चों का नहीं है. . साथ ही जो आगे बढ़कर अपनी मंजिलें पा चुकीं हैं. उनकी जिम्मेदारी अब और बढ़ गई है. क्योंकि वे जानती हैं कि उन्होंने * घुटन से अपनी आज़ादी खुद कैसे अर्जित की है*. सशक्त सहभागिनी बनकर सबसे पहिले सहयोग की पहल करना है उनको.अपने *परिवार*-*पास पड़ोस*-*समाज* में आज से ही शुरुआत करनी है. . समाज के एक व्यक्ति,परिवार'जाति;धर्म, वर्ग की बात नहीं पूरे भारत के कोने-कोने में अलख जगानी है.--.
· *तकदीर संवरती है उनकी जो खुद को संवारा करते हैं ,तूफां में जब हो किश्ती तो, साहिल भी किनारा करते हैं.*
· हम जानते हैं कि महिलाओं को *अधिकार* मिलने के बाद भी उनका पालन नहीं होता. . उसी तरह हर *कानून* उपलब्ध होने पर भी क्रियान्वन नहीं होता.. वास्तव में *नारी* को *सामाजिक बुराइयों* के विरुद्ध स्वयं "अपने व अपने लोगों" से सम्मानपूर्वक अपनी लडाई लड़नी है. समाज में लोगो की मानसिकता में भी बदलाव आया है पर सही जानकारी के अभाव में उनकी इच्छा व आशा पूरी नहीं हो पाती. परिजन व महिला स्वयं अभी भी *नैतिक मूल्यों* के विरोध में अपने ही लोगो के विरुद्ध पूरी तरह आवाज नहीं उठा पाते. अपनी पहचान बनाने के लिए महिलाओं को अपने अधिकार जानने होंगे .तभी नई ताकत एवं पक्के इरादों से भेद-भावहीन समाज बनाया जा सकेगा जो सही विकास का मार्ग खोल सकेगा. . *हमारा भारतीय समाज एक नए सामाजिक स्वरुप में उज्ज्वलता की ओर अग्रसर* होगा.. महिला व उनके परिजनों ,साथ ही समाज के हर वर्ग के जागरूक नागरिक के हित-चैतन्य-आस्था-विश्वास हेतु समस्त जानकारी बहुत संक्षेप में प्रस्तुत है.. . *कुछ मुख्य अधिकार - कानून व सहायता*.
· संविधान के अनुसार महिलाओं के मौलिक अधिकार----- मौलिक अधिकार वे बुनियादी अधिकार हैं जो जीवन के लिए जरूरी होते हैं. हर मनुष्य को कुछ अधिकार की जरुरत होती है जिसके बिना वो सही जीवन नहीं जी सकता १ समानता का अधिकार( संविधान के अनुसार सभी नागरिक सामान हैं.धर्म,लिंग,जाति या जन्म स्थान का आधार पर भेद-भाव नहीं किया जा सकता. २.स्वतंत्रता का अधिकार(जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) ३ शोषण के विरुद्ध अधिकार(किसी भी प्रकार का शारीरिक-mansik शोषण ) ४ धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार ५ संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार ६. संवैधानिक उपचारों का अधिकार . . मुफ्त कानूनी सहायता-औरतें और बच्चे (देश की हर अदालत में मुफ्त कानूनी सहा.केंद्र उपलब्द्ध हैं). . अन्य आवश्यक अधिकार व कानून . 1 पिता की संपत्ति पर अधि.2 शादी के बाद नाम बदलने की जबरदस्ती नहीं 3 अपनी कमाई व स्त्री धन पर अपना अधि.4 समान काम समान वेतन 5 18 वर्ष की उम्र के बाद अपने निर्णय को स्वतंत्र.. कानूनी सहायता एवं सजा (केवल मुख्य जानकारी का उल्लेख) . . (निम्न कोई अपराध होने पर किसी महिला- संगठन,जागरूक संस्था या सक्षम व्यक्ति को साथ ले जाना चाहिए ) 1.ऍफ़.आई.आर.कराएं.रिपोर्ट न लिखने पर (jaen) 1 .कलेक्टर.2 स्थानीय समाचार पत्र-मीडिया को जानकारी 3 राष्ट्रीय महिला आयोग 4 अपने राज्य के महिला आयोग.. 1 बलात्कार ------ धारा 376 -सजा कम से कम ७ से १० साल या आरोप सिद्ध होने पर उम्र कैद.जुरमाना . २ बाहरी हिंसा या छेड़छाड़ धारा २९४ या ३५४ किस तरह का आरोप है उसपर आधारित सजा जेल.. ३दहेज़-वर्त्तमान में समाज की सबसे बड़ी सामाजिक समस्या. . लेना+देना दोनों अपराध. कम से कम ६ माह की सजा+१०,००० रु. बढकर १५,००० रु.,५ साल की सजा. दहेज़ हत्या -३०४ B-साक्ष्य+गवाह दोनों हो .(केस सिद्ध होने पर बड़ी से बड़ी सजा का प्रावधान ) . . ४ पत्नी को तलाक़ या छोड़ने के बाद धा. १२५ के अंत.गुजारा भत्ता.बच्चे का खर्चा . . ५ घरेलू हिंसा होने पर-४९८ A १८६० शारीरिक या मानसिक क्रूरता-नए कानून के अनुसार उत्पीडन हिंसा करनेवालों को तुंरत गिरफ्तार,पूछताछ या सफाई देने का भी मौका नहीं (इस कानून का बहुत दुरूपयोग भी हो रहा है अक्सर दुर्भावना से लड़की या उसके परिजन विरोधी पक्ष को झूठा भी फंसा दे रहे है जो नहीं होना चाहिये पीडीत पक्ष ही रिपोर्ट करे,अन्यथा ये सुविधा हटने से मुश्किल आ सकती है. ). . ५. कामकाजी महिला के लिए कानून -खास अधिकार .१ सरकार द्वारा निर्धारित वेतन की उपलब्धता २ महिलाओं की सुरक्षा के अनुसार ही काम लेना जरुरी. ३ प्रसूति सुविधा(अभी और बढा दी गई है) . . ६ लिंग जाँच या भ्रूण हत्या रोकने का कानून.अधि.१९९४.इ. धारा ३१२ -३१६ . . ५ साल की कैद व १०,००० रु. जुरमाना , दूसरी बार में ५०,००० तक . . महिलाओं के लिए मुख्य सरकारी योजनाएं. . १ बालिका सम्रद्धि योजना २ मात्रत्व लाभ योजना ३ विधवा पेंशन ४ वृद्धावस्था पेंशन.५ इंदिरा आवास योजना ६.अनुसूचित या गरीबी से नीचे वर्ग की लड़की के विवाह हेतु सहायता.७ राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना ८ स्वर्ण जयंती रोजगार योजना १० गांवों के पंचायती राज्य में ३३% आरक्षण 11.प्रत्येक समिति में महिला व दलित महिला की भागीदारी निश्चित. और भी अनेक योजनाएं हैं समयानुसार बदलती रहती हैं. . हम आप सब जानते है *मानव जीवन एक सामूहिक संस्था *है. समाज के सुगम सञ्चालन के लिए परिवार बने हैं . स्त्री-पुरुष व उनका परिवार एक दुसरे के पूरक है उनके आपसी सामंजस्य के बिना कुछ नहीं हो सकता.वास्तव में परिवार के हर सदस्य की अपनी प्रतिष्टा-आवश्यकता–जिम्मेदारी-बाध्यता होती है.हमारी पूरी श्रंखला केवल *समाज को चैतन्य* करने की कोशिश है क्योंकि यदि हमारे परिवार की *महिला-शक्ति* का ह्वास होता रहा तो समाज कहाँ चला जायेगा अकल्पनीय है. उसके समग्र विकास के लिए हर परिवार थान ले तो भारत कितना उज्जवल होगा जरा सोचकर देखें…………. . पुराणों में माना गया है .. जग जीवन पीछे रह जावें,यदि नारी दे न पावे स्फूर्ति .इतिहास अधूरे रह जावें ,यदि नारी कर न पावे पूर्ति.. क्या विश्व कोष रह जावें ,होवे अगर न नारी विभूति .क्या ईश्वर कहलायें अगम्य,यदि नारी हो न रहस्य मूर्ति.
§ *अलका मधुसूदन पटेल*