Tuesday, October 9, 2012

अलका मधुसूदन पटेल ,लेखिका+साहित्यकार.


नारी सशक्तिकरण-----

IF YOU WISH TO REACH THE HIGHEST ,BEGIN AT THE LOWEST

*नारी महिमा* -

प्रभु सत्ता की प्रबल शक्ति ,अति मानवता का अतुल विकास.
पूर्ण विश्व की जन्मदायिनी ,विधि संस्कृति का सफल प्रयास.
देवगणों की वन्दनीय नित , हरी की एकमात्र छाया.
नारी की सत्ता इस जग में , नारी की ही है माया.

*आवश्यकता* -

आज की परिस्थितियों में नारी शक्ति को अपनी पहचान बनाने के लिए अपनी विशिष्टता का अहसास करके आत्मबल बढ़ाना होगा. जिसके लिए बचपन से बच्ची के मन में आत्म-विश्वास जाग्रत करना होगा. प्राचीन समय से चली आ रही प्रथाओं और लड़कियों के प्रति समाज में अपनाये जा रहे दोहरे मापदंड-शोषण को कम करने हेतु आवाज उठाना ही होगा. इसके लिए आत्म-निर्भरता की ओर कदम बढ़ाने होंगे. इसके लिए बालिका के अपने परिवार में जन्म लेते ही उसकी शिक्षा -देखरेख में भेदभाव नहीं रखकर समानता लाना होगा. जिस भी विषय में उसकी रूचि हो उसी में पूर्ण शिक्षिता बनने से न केवल उसका आत्म सम्मान वरन उसके परिजनों का सम्मान बढेगा.ज्ञातव्य है जब हमारा आत्मबल जाग्रत होता है तो दुनिया की समस्त शक्तियां छोटी पड़ जाती हैं .नारी-शक्ति को स्वयं इसका अहसास कराना होगा.  यदि एक बालिका का प्रारंभ से सही पालन-पोषण किया जाये तो वह एक पुरुष से कहीं पीछे नहीं है. हाँ प्रकृति प्रदत्त शारीरिक कोमलता उसकी कमजोरी नहीं संसार का अद्भुत वरदान होता है. सदियों से महिलाओं को वैश्विक स्तर में भी समाज के हाशिये पर रखा जाता रहा है. उनका सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक - भावनात्मक तरीके से मजबूरी व मासूमयित का फायदा उठाये जाता रहा है. उनको आधी दुनिया तो बोला जाता है पर उनको हाशिये में रखकर उनके मानव-अधिकारों तक से वंचित रखा जाता रहा है.

मेहनत तो रंग लाती है चट्टान तोडिये ,पावन पसीना ही तो गंगाजल का रूप है.

*चैतन्यता* -

उठी है मन में तरल तरंग ,भरे उत्कर्षित अंग उमंग.
हमीं हैं भारत की ललना ,प्रण जो कभी न टलना.

आज सामाजिक,सांस्कृतिक ,पारिवारिक मूल्यों में निरंतर चेतना बढ़ रही है, परिवेश बदल रहे हैं. वास्तव में समाज में भी कर्तव्यबोध की भावना बढ़ रही है धीरे-धीरे ही सही. महिलाऐं अपने आप को सक्षम बनाकर पुरुष वर्ग के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं. अतः अब परिवारों में भी लड़की होने को अभिशाप नहीं मानने वालों की संख्या में वृद्धि निश्चय ही हो रही है. मुख्यतः नव-युवा वर्ग अपनी छाप छोड़ने में सशक्त बना है. समाज के लगभग हर क्षेत्र में बहुत तेजी से महिला शक्ति अपना स्थान बढाती जा रही है. अपनी योग्यता से उसने अपना इतना ऊँचा स्थान बना लिया है. लोग उसका मान करने लगे हैं ,उसके आधीन काम करने से गुरेज नहीं कर सकते क्योंकि अपनी शक्ति पहचान के नारी ने स्वयं को उत्कृष्ट बना लिया है. कह सकते हैं उसकी दुनिया बदल रही है, जिसकी वह स्वयं हक़दार है. संघर्ष करके अपना यह स्थान वह स्वयं बना रही है.

*सामाजिक परिवर्तन* -

हमारी ही मुठ्ठी में है आकाश सारा,जब भी खुलेगी तो चमकेगा तारा.
कभी न ढले वो ही सितारा, दिशा जिससे पहचाने ये संसार सारा.

पुरुष वर्ग के साथ परिवार में अब विशेषकर महिलाओं को भी अपनी पुत्रियों के लिए या बालिका के लिए अपना नजरिया बदलना होगा क्योंकि जीवन की जिन कठिनाइयों से वे बड़ी-पली हैं ,उनको लगता है की उनकी पुत्री को भी वही कष्ट न हो. उनकी खुद की जिंदगी में वे जिस कमी ,भेदभाव,शोषण या ना-इंसाफी का शिकार हुईं हैं ,होती रही हैं. उनकी बेटी - बहू या समाज की हर बच्ची के साथ न हो. इसीलिए वे अपने परिवार में पुत्री के आगमन से निराशा से भर उठतीं हैं . सर्वप्रथम वे भी किसी भेद-भाव-भुलावे से अपने मुक्त रखें. विशेषकर अपने घर में बेटी-बेटे में कोई भेदभाव नहीं करके उनको समान अवसर दें.
सही मानें तो जब परिवार की मुखिया महिला ही अपने परिवार को सही संस्कार व सामाजिक मूल्यों के साथ बचपन से ही बेटी को पूर्ण जागरूक व सशक्त बनाएगी तो सारे परिवार व समाज में अन्य लोग स्वतः ही अपनी बच्ची को साहसी-योग्य बनायेंगे. उसको उसके अंदर की शक्ति को मनोवैज्ञानिक तरीके से बढ़ावा दिया जाये ना कि प्राकृतिक शारीरिक कमजोरी का अहसास कराके उसका मनोबल कम किया जाये.
हर क्षेत्र में जागरूकता की बहुत जरुरत होती है.उच्च से उच्च शिक्षा दें.

“रबिन्द्रनाथ टैगोर” ने कहा है ,

where the mind is without fear & the head is held high ,where knowledge is free .

*पारिवारिक परिवर्तन* -

अपने परिवार से ही शुरुआत करके व्यापक बदलाव करने होंगे. समाज के हर वर्ग के लिए इस समस्या के निदान ढूंढने होंगे. वैसे भी सर्व-विदित है कि एक बेटी दो कुलों को जोड़ने के साथ ,अपने परिवार से दूसरे परिवार में अपने को आत्मसात करने के बाद भी ( अपनी शादी के बाद) जुडी रहती है पूरा ध्यान रखती है. हाँ हमें अपनी बच्चियों को संपूर्ण सशक्त -सफल -अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता की पहल उसके जन्म से ही शुरू करनी होगी. जब तक हम स्वयं अपने घर में से ही हमारी बच्चियों का आत्मबल बढ़ाने का ध्यान नहीं रखेगे तो किसी जादुई चमत्कार की आशा दूसरे से नहीं कर सकते. अभी हमें बहुत कुछ करना बाकी है.पहला कदम उठाकर समाज में बदलाव होगा ही. हमारी बेटियों को उनकी शिक्षा के साथ अपनी रक्षा की जानकारी भी देनी ही होगी. ऐसे अनेकों माध्यम हैं कि माँ-बाप घर बैठकर भी अपनी पुत्री के प्रति निश्चिन्त बने रहें. बाहरी दुनिया के उतारों -चढ़ावों के साथ उससे सावधानी व फरेबों से बचने के साधन. अच्छे-बुरे,सही-गलत की पहचान से उसके व्यक्तित्व को संवारने की जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभानी होगी.

The future belongs to those who believed in the beauty of their dream .

*हिंसात्मक पहलू* -

इस अँधेरी रात को हरगिज मिटाना है हमें ,इसलिए हर महिला की शक्ति जगाना है हमें.

बाहरी हिंसा व घरेलू हिंसा के साथ समाज में दिनों-दिन बढ़ते हिंसात्मक व्यवहार-बलात्कार से अपनी सुरक्षा व अपने परिवार की सुरक्षा किस तरह की जाये इसकी जानकारी हेतु वृहद उपाय किये जाने होंगे. घरेलू+कामकाजी महिलाओं को अपनी भूमिका सक्षम बनानी होगी ,अपनी बच्चियों को अधिक मूलभूत सुविधा दिलवाने के साथ सतत निगरानी के दायित्व भी निभाने होंगे व उन पर विश्वास करके उनके कर्तव्यों से परिचित कराना होगा ताकि वे किसी गलत लालच या मतिभ्रमित होने से बचें. वे समाज-परिवार व अपनी जिंदगी में सामान्य संतुलन बनाकर निडर होकर अपना जीवन सार्थक सकें. उनके साथ होते अनाचार या ज्यादती को वे खुलकर व अपनी बात कहने में हिचक महसूस ना करें. बालिकाओं की प्रगति व उत्थान के लिए आन्दोलन का प्रारंभ नए तरीके से करना है तो बारम्बार अनेकों अत्याचार व दुर्घटनाओं से हम मात्र विचलित होकर नहीं रहेंगे.

*सशक्तिकरण* -

कंटकों में पथ बनाना सीख लो कठिनाइयों को सरल बनाना सीख लो .
जिंदगी सुखद तुमको लगने लगेगी ,जिंदगी को अच्छा बनाकर देख लो.

आत्म सम्मान से संस्कृति ,धरोहर की रक्षा करके ,सक्षम दृढ संकल्पित होकर नवदीप प्रज्वलित करना है.आज की स्त्रियाँ उच्च स्तरीय उच्चकोटि विराजित हुईं हैं आसमान में उड़ने की कोशिश करें ,पर उनके पैर जमीन पर रहें .झूटे अहम् या घमंड में न आयें. आधुनिक समाज भी जIन चूका है की अब हमारी महिला शक्ति को पिंजरे में बंद रखने का समय जा चूका है. महिला शक्ति एक साथ मिलकर चलें ,इतनी कड़ी मशक्कत से आज वे अपना जो स्थान बना पायीं हैं.  उसमे वे अपनी वैचारिक क्षमता बढाकर  चारित्रिक बल मर्यादा,सीमा ,गरिमा का गौरव सदैव बनाये रखें.

श्रंखलाएं हों पगों में,गीत गति में है सृजन का ,

है कहाँ फुर्सत पलक को ,नीर बरसाते नयन का,

उठो आगे बढ़ो ,ये समय है कुछ कर दिखाने का.

The first step forward ,solving a problem is to begin .

*जयहिंद-जय महिला-शक्ति*.

अलका मधुसूदन पटेल ,लेखिका+साहित्यकार.







Saturday, July 17, 2010

सामाजिक सरोकार
*अपनी संपूर्ण सुरक्षा की पूर्ण चैतन्यता-जागरूकता+कानून सम्बन्धी जानकारी*.
परिवारों में विशेषकर भारतवर्ष में बेटी के जन्म लेते ही ये बात बचपन से उसके मन में भर दी जाती है कि उसके भाई की तुलना में वो शारीरिक स्वरुप में कमजोर है ,बहुत प्रकार के अवरोध(रोक) उसकी कम उम्र से ही लगाना प्रारंभ हो जाते हैं .लड़के की तुलना में उसको कुछ विशेष सावधानी-देखरेख से ही पाला जाता है. जो उसकी मानसिकता को कमजोर बना देते हैं. छोटी सी बच्ची अपने घर में ही अपने आपको हीन या किसी कमी से ग्रस्त मानने लगती है क्योंकि उसके लिए जीवन के हर क्षेत्र में अलग-अलग प्रकार से रोक लगने से उसकी स्वतंत्रता में कमी-बाधक हो जाती है.
बिना जाने ही समाज के प्रति या अपने आसपास वालों के प्रति उसके मन में एक प्रकार चिंता व जाना-अनजाना डर या अलगाव समां जाता है.
ये बिना किसी भेद भाव से समाज के हर वर्ग के लगभग हर छोटे-बड़े ,निम्नवर्गीय-मध्यमवर्गीय-उच्चवर्गीय ,हम-आपके सबके परिवारों में होता है. अधिकांश परिवार अपनी बेटी की सुरक्षा की द्रष्टि से उसपर रोक लगाने को अपने को मजबूर पाते हैं .इस सबके पीछे परिवार का उद्देश्य हर जगह अपनी बच्ची के साथ सिर्फ भेदभाव के लिए ही नहीं होता.व्यक्तिगत नहीं होकर कहीं निःस्वार्थ मजबूरी भी मानी जा सकती है या अपनी बेटी के प्रति अपनी सघन जिम्मेदारी-स्नेही उत्तरदायित्व भी.
हालाँकि हर बात में बारबार ऐसे अड़ंगे-थोड़ी समझ आने पर स्वाभाविक हमको, हमारी बेटियों या नारी शक्ति को अस्वीकार व असंतुष्ट-कुंठित बना देती है.
आज के विचार के अनुसार माना जाये तो घर की बिटिया को एक जिम्मेदार स्वस्थ नागरिक बनने की प्रक्रिया में यही से कमी आ जाती है.
सत्य है कि उसके मानवाधिकार का हनन भी शुरू हो जाता है.
पर इस सबके बीच हमें हमारे समाज के मूलभूत ढांचे के बारे में सोचना पड़ेगा व क्यों ऐसा हुआ है ,होता है या हो रहा है. क्यों ये असुरक्षा की भावना हमारे बीच इतनी बढ़ गई है ,जो सामाजिक परिवर्तन होने के बावजूद भी इतने पारिवारिक+सामाजिक बंधन हमारी नारी शक्ति के सामने खड़े हैं.
वास्तव में आवश्यकता है कि हमारे घर में बच्ची को उसके बचपन से ही मानसिक ही नहीं शारीरिक द्रष्टि से भी साहसिक प्रवृति का बनाया जाये. उसको पूरी वैचारिक स्वतंत्रता दी जाये.वो स्वयं अपनी बौद्धिक सामर्थ्य के अनुसार अपना सही निर्णय ले सकेगी .
अनेक तरीके हैं जिनके द्वारा वो अपने-आप को सुरक्षित रखने के साथ सावधान रख सकती है. सबसे बड़ी बात उसके मन में इस प्रकार का कोई भय न भरके उसे जागरूक और चैतन्य बनाया जाये .उसे अपने शरीर की प्राकृतिक संरचना के अनुसार क्या ध्यान व सावधानी रखनी चाहिए इसकी सही जानकारी दी जाये .
किन बातों व परिस्थितियों में निर्भय होकर संयम खोये बिना क्या कर सके. साथ ही अपने लिए बिना किसी के कहे उचित अनुचित की सीमा रेखा तय कर सकें. विशेषकर दिग्भ्रमित न हो. आत्मनिर्भर व योग्य शिक्षित होकर भी जरूरत पड़ने पर विवेक न खोकर अपनी रक्षा को सक्षम बने.
वैसे भी प्रेक्टिकल रूप से ये तो संभव ही नहीं है कि किसी बलात्कारी को या किसी हिंसात्मक व्यवहार को ,चाहे घरेलू हिंसा ही हो ,को कहीं रोका जा सके क्योंकि गलत या बलात हरकत करने वाले जरुरी नहीं है कि कही रास्ते में मिलें या रात को ही किसी भी उम्र की महिला या लड़कियों को मिलते हैं या मिलेंगे. यदि वो कही अकेली जाती है तो. ऐसे लोग तो अवसर देखते रहते हैं.
वे*घर-बाहर* कही भी ,कभी भी मिल सकते हैं.
कई उदाहरण सामने हैं कि *रक्षक भी भक्षक* बन जाते हैं.
वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है अपनी संपूर्ण सुरक्षा की पूर्ण चैतन्यता व जागरूकता+कानून सम्बन्धी जानकारी.
किसी भी बात की अधिक रोक-टोक लगाने के बदले नारी-शक्ति को किन्ही भी परिस्थितियों में अपनी सुरक्षा के लिए तैयार होना होगा ,साथ ही हमारे परिवार-समाज की युवतियों के साथ युवा शक्ति को भी सही दिशा-सही कार्यों की प्रेरणा मिलती रहे जो स्वयं आगे आकर इस तरह के कार्यों को रोकने के लिए अपनी पूरी सहभागिता प्रदान कर सकें.


अलका मधुसूदन पटेल ,*लेखिका-साहित्यकार*

Sunday, July 11, 2010

*गंभीर विचार*
पिछले कुछ दिनों से एक बिना मतलब की छीटाकशी या निरर्थक बातों-लेखन से कुछ लोग न केवल अपना समय व्यर्थ कर रहे हैं बल्कि अपनी ओर दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ये अनुचित *अति* कर रहे हैं ,जो उचित नहीं है.
यदि हमारी शक्ति अच्छे कार्यों-विचारों की तरफ जाये तो सही होगा.
सार्थक सोच या निरर्थक विचार
ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये ,अपना तन शीतल करे, औरों को सुख होए.
अक्सर हर बात या वस्तु के दो पहलू होते हैं. अच्छा-बुरा, गलत-सही ,आनंद-विषाद, सत्य-असत्य, समझदार-नासमझदार, हार-जीत, होशियार- बेवकूफ, जानबूझकर-अनजाने में, इसी तरह और भी बहुत हैं.
बुद्धिजीवी होकर भी कभी गलती हो जाती है और कभी अनजाने में अनचाही भूल कर बैठते हैं .पर जब जान-बूझकर कोई ऐसा काम लगातार किया जाये जो दूसरों के लिए अहितकर हो , वेदना देनेवाला हो, नीचा दिखाने या चिढाने के लिए हो या घरेलू हिंसात्मक(बोली) प्रवृति लिए हो. तो ये सर्वथा वर्जित है.
"सर्वप्रथम ऐसे कुछ गिने-चुने लोगों से सावधान रहें व अपना विवेक न खोएं क्योंकि उनका तो लेखन में या कार्यों में ऐसे कृतित्व से कोई वजन (वेट) ही नहीं है. वे अपने इन कुत्सित व गलत विचारों द्वारा दूसरों को केवल व्यग्र या क्रोधित करने की चेष्टा करते रहते हैं. ताकि उनपर दूसरे मनीषियों-माननीयों का ध्यान जाये. समझ लें ऐसे लोगों के पास वैचारिक शक्ति ही नहीं है कुछ अच्छा बोलने या सोचने की ,ध्यान न ही दें न कोई प्रतिक्रिया कभी भी जाहिर करें.
संभवतः उनको स्वान्तः सुखाय का आनंद मिलता हो ,त्याग कर दीजिये उनके निरर्थक शब्दों को.
कथन कटु हो सकता है पर सत्य है. थोडा सा ज्ञान हासिल करके आजकल बहुतायत लोग बुद्धिमानों की श्रेणी में शामिल होने की चाहत रखते हैं पर जानकारी के अभाव में निरर्थक बातों या कामों से जानबूझकर अपने को बड़ा(ज्यादा महत्वपूर्ण) दिखाने के लिए बिना कुछ सोचे ऐसा करने की कोशिश करते हैं ,शायद वे नहीं जानते कि ये उन्ही के लिए सही नहीं है.
महत्वपूर्ण - उनके पास सार्थक सोच ही नहीं होती वे ऐसा न मानें .हाँ निरर्थक विचार जो उनके मन में भरे पड़े हैं उसका उपयोग न करें .अपना मन-विचार श्रेष्ट कर्मों में लगायें ,तो न केवल उनका लेखन+ब्लॉग बल्कि जीवन भी सार्थक होगा. सभी उनको पढ़ना भी चाहेंगे. स्वयं अपने व अपनों की नज़रों में बहुत ऊँचा उठ पाएंगे. अपनी योग्यता-बौद्धिक क्षमता को सही दिशा में लगाकर निश्चय ही उत्क्रष्ट्ता की ओर बढ़ेंगे व अपनी बुद्धिमत्ता सही स्वरूप में साबित कर सकेंगे.
हमारे भारत की परंपरा-संस्कार ये नहीं सिखाते कि अनर्गल प्रलाप ,गलत-अविवेकपूर्ण *शब्दों- द्रश्यों* का प्रयोग हम किसी के लिए भी न करें या गलत सोचें. किसी भी बात को सही तरह से कहा जा सकता है व उसका असर ज्यादा रहकर महत्वपूर्ण बनता है.
अपनी भाषा व कार्यों में शाब्दिक गरिमा-गौरव बनाये रखकर ही हमें आपस में एक-दूसरे का सम्मान करना सीखना ही होगा.
ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये , अपना तन शीतल करे ओरों को सुख होए .
आपसी प्रतिद्वंदिता, एक दूसरे का भेद-भाव या नीचा दिखाने की कोशिश किये बिना क्यों न हम अपना ज्ञान, जानकारी, श्रेष्टता ,अनुभव सहयोग करें+बाटें. ज्ञातव्य है हमारे अधिकतर भाई-बहनें कर भी रहे हैं. परोक्ष-अपरोक्ष रूप में तो हम सब एक दूसरे से वैचारिक-मानसिक रूप में जुड़े हैं. विज्ञान के वरदान से इन्टरनेट बहुत अच्छा माध्यम बन चूका है. कुछ पहले समय तक तो हमें इतना बढ़िया मौका ही नहीं मिलता रहा है कि हम सब अपने विचार -मंतव्य आसानी से बाँट सकें.
संसार के अथाह ज्ञान सागर व मन की गहराई में तो जाने कितना विशाल भंडार -खजाना पड़ा है कि हम उसको सामूहिक समेटने व सामने लाने का प्रयास करें तो भी कम पड़ेगा पर हम सब कितने ऊँचाइयों तक पहुँच सकते हैं सोच नहींसकते.
कोई भी किसी से कम ज्यादा नहीं है ,आपस में ही होड़ लेने की आवश्यकता नहीं होती ,सभी अपने-अपने क्षेत्र-कार्य में सर्वश्रेष्ट हैं. हाँ एक-दूसरे की कमियों-बुराइयों-पिछड़ी-पिछली बातों पर ध्यान न देकर कुछ प्रशंसनीय प्रयास किया जाना चाहिए जो हमारी ही योग्यता को प्रदर्शित न करे बल्कि दूसरे लोगों के लिए प्रेरणा बने व हमें उन पर गर्व हो वे इसी के लिए प्रतिबद्ध रहें.
कबीर मन निर्मल भये जैसे गंगा नीर ,पाछे-पाछे हर फिरे कहत कबीर कबीर.
तात्पर्य हम अपना मन-दिमाग निर्मल-सही दिशा में रखें तो लोग स्वयं आपको पढना चाहेंगे.
“--हम सभी लेखकों-लेखिकाओं समूह के लिए हम सभी की ओर से- -“,
अलका मधुसूदन पटेल , *लेखिका -साहित्यकार*

Friday, June 18, 2010

झाँसी की रानी को श्रद्धांजलि

*ओ! बुंदेला भूमि जननी रख ले प्रदेश का पानी ,एक बार फिर से दे दे लक्ष्मीबाई सी रानी*
आज १८ जून को झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई की पुण्य तिथि है ,उनकी स्मृति में सारे भारतवर्ष की न सिर्फ महिला-शक्ति बल्कि हर भारतीय का मस्तक गर्व से ऊँचा होता है. हर नारी को झाँसी की रानी से प्रेरणा लेकर साहसी बनना है व आवश्यकता पड़ने पर विवेकपूर्ण निर्णय लेकर अपने कदम बिना किसी से डरे आगे बढ़ाना होगा. ज्ञातव्य है सदियों से ही हमारे देश की नारी ने बड़े से बड़े कार्य किये हैं ,वर्तमान में भी नारियों ने वैसे भी हर क्षेत्र में अपने परचम लहराने प्रारंभ कर दिए हैं लगभग हर जगह आगे आकर अपना लोहा मनवा रही हैं ,तो फिर किसी भी बात(समस्या) से न घबराकर अपनी गरिमा बनाये रखकर आगे बढते रहना है.
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई- नारी शक्ति के साहस व शौर्य का गुण-गान आज भी समस्त बुंदेलखंड के कण-कण में ही नहीं संपूर्ण भारतवर्ष के जन-मानस के रग-रग में व्याप्त है.जहाँ जाकर उनके बारे में जानकर हमारे मन में भी वैसा ही स्वाभिमान व एक अपूर्व शक्ति जाग्रत हो जाती है . हमें हमारी मानसिक व शारीरिक शक्ति चैतन्य करनी ही होगी.
*झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता प्रशस्ति विभिन्न स्वरूपों में*
प्रख्यात कवियों+साहित्यकारों ने उनको अपनी भावनात्मक श्रद्धांजलि अपने अलग-अलग रूप में प्रगट की है.
• श्रीयुत बाई लक्ष्मी शोभित त्रिविध स्वरुप ,सभा सरस्वती ,गृह रमा, युद्ध कालिका रूप.
तज कमलासन ,कर कमलासन,गहि रंग तलवार,कुल कमला काली गयी,झाँसी दुर्ग द्वार.
.--वियोगी हरि
• देश की गुलामी और नमक -हरामी इन दोनों से ही लक्ष्मी देश लक्ष्मी सी छली गई ,
आखिरी प्रणाम कर झाँसी को उसांसी भर, साथ कर सुरमों के एक थी अली गई,
विप्रधन श्याम हांकते ही रहे बांटें अरि , तकते ही रहे जन कौन सी गली गई,
बैरियों की भीर थी , हाथ शमसीर थी ,यों चीरती फिरंगियों को तीर सी छली गई.
घनश्यामदास पाण्डेय
• गर्दन पर गिर पड़ने वाली ,काँटों से कढ़ जानेवाली ,अरि की बोटी से चटख-चटख ,छोटी तक चढ़ जानेवाली '
छू गई कहीं पर किंचित भी,जिसको इनकी विष बुझी धार,विष चढ़ते ही गिर पढ़ते थे अरि एक-एक पर चार.
• प्रतिपल शोणित की प्यास थी,पर पानीदार कहती थी ,जिसके पानी से पानी में बेलाग आग लग जाती थी.
*लक्ष्मीबाई की सु स्मृति का गति हूँ अनुपम आव्हान ,खोजा करती हूँ दुर्गा की पदरज पावन पुण्य महान.*
*हम सभी महिला शक्ति की ओर से हमारी प्रेरणा झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को हम सबकी ओर से श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं .*
“उनकी शक्ति से अभिमंत्रित व विजित ” ,
कोमल है कमजोर नहीं ,शक्ति का नाम नारी है ,सबको जीवन देनेवाली मौत भी उससे हारी है.
इल्म ,हुनर, औ दिलोदिमाग में कहीं किसी से कम नहीं,वह तो अपने सारे अधिकारों की पूरी अधिकारी है.
बहुत हो चुका ये दुःख सहना अब इतिहास बदलना है ,नारी को अब कोई कह न पाए ये अबला बेचारी है.
*जय हो रानी लक्ष्मीबाई की , जय हो भारतीय नारी शक्ति की एकता की ,जयहिन्द*
*अलका मधुसूदन पटेल ,लेखिका -साहित्यकार*